जीवन एक प्रतिध्वनि है
एक बार की बात है एक शहर में एक बहुत धनवान सेठ की दुकान थी जो शहर में सबसे अधिक चलती थी। उसकी दुकान पर हर तरह का सामान मिलता था इसलिए दुकान पर हर समय ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी।

उस दुकान पर एक छोटा सा व्यापारी सेठ को मक्खन सप्लाई करता था जो कि एक गोल पेढ़े के आकार का आता था और प्रत्येक पेढ़े का वजन एक किलोग्राम था। वह जितने पेढ़े सेठ को देता था उसके मूल्य के बदले घर की जरूरत में आने वाले सामान जैसे चीनी, चावल, दालें इत्यादि ले जाता था। यह सिलसिला वर्षों से चलता आ रहा था और दोनो एक दूसरे पर पूर्ण विश्वास रखते थे।

एक दिन वह व्यापारी उस सेठ को मक्खन के 50 पेढ़े अर्थात 50 कि.ग्रा. मक्खन देकर गया। सेठ उस पेढ़ो को एक बड़े फ्रिज में रखता जा रहा था। पेढ़े रखते-रखते सेठ के मन मे विचार आया कि क्यों न एक पेढ़े का वजन जांच कर लिया जाये। सेठ ने एक पेढ़ा तराजू पर रखा था उसका वजन 900 ग्राम निकला। सेठ ने दूसरे पेढ़े को तराजू पर रखा उसका वजन भी 900 ग्राम निकला। सेठ को क्रोध आ गया और उसने सभी पेढ़ो का वजन करवाया। उसके आश्चर्य की सीमा ही न रही जब सब पेढ़े 900 ग्राम के ही निकले।
अब सेठ आपे से बाहर हो गया। उसने तुरन्त उस व्यापारी को बुलावा भेजा। व्यापारी आया तो सेठ ने उसे पेढ़ो का वजन करके दिखाया और खूब भरा-बुला कला। उस व्यापारी को कहा गया कि वह ईमानदार नहीं है और उसमें बेईमानी कूट-कूट कर भरी हुई है। उसे यह पाठ भी पढाया गया कि व्यापारी को ईमानदार होना चाहिए।

छोटे व्यापारी ने हाथ जोड़कर बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया कि ‘सेठ जी, मैं एक बहुत छोटा व्यापारी हूँ और मेरे पास बाट खरीदने के लिए भी पैसे नहीं थे इसलिए जब आपकी दुकान से मैं घर के लिए जरूरत का सामान खरीदता था तो सामान का एक पैकेट जो कि 1 किलोग्राम का होता था, उसे तराजू के एक तरफ बाट के स्थान पर रखकर दूसरे स्थान पर उतने ही भार के अनुसार मक्खन को रखकर तौल कर एक पेढ़ा बनाता था जो आपको सप्लाई करता था।’
सेठ को अपनी करनी समझ में आ गई। उसे अपने आप पर शर्म आने लगी थी। सेठ को सही गलत का फर्क महसूस हो गया था। वह मन ही मन सोच रहा था कि बेईमान तो वह है न कि वह छोटा गरीब व्यापारी। उसे ही अपने व्यापार में ईमानदारी रखनी चाहिए थी।

ज्ञानी लोग सही कहते हैं कि जीवन एक प्रतिध्वनि है जो हम अच्छा या बुरा इस संसार को देते हैं कुछ समय बाद वही हमें प्रतिध्वनि के रूप में हमारे पास वापिस आ जाता है। सत्य ही है कि हम दूसरों के लिए जो अच्छा ) या बुरा सोचते या करते हैं, हू-ब-हू वही हमें किसी न किसी तरह वापिस मिल ही जाता है।
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