शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

माँ पर कविता

   मां पर कविता

मैं अपने छोटे मुख कैसे करूँ तेरा गुणगान
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान
माता कौशल्या के घर में जन्म राम ने पाया
ठुमक-ठुमक आँगन में चलकर सबका हृदय जुड़ाया
पुत्र प्रेम में थे निमग्न कौशल्या माँ के प्राण
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान
दे मातृत्व देवकी को यसुदा की गोद सुहाई
ले लकुटी वन-वन भटके गोचारण कियो कन्हाई
सारे ब्रजमंडल में गूँजी थी वंशी की तान
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान
तेरी समता में तू ही है मिले न उपमा कोई
तू न कभी निज सुत से रूठी मृदुता अमित समोई
लाड़-प्यार से सदा सिखाया तूने सच्चा ज्ञान
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान
कभी न विचलित हुई रही सेवा में भूखी प्यासी
समझ पुत्र को रुग्ण मनौती मानी रही उपासी
प्रेमामृत नित पिला पिलाकर किया सतत कल्याण
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान
‘विकल’ न होने दिया पुत्र को कभी न हिम्मत हारी
सदय अदालत है सुत हित में सुख-दुख में महतारी
काँटों पर चलकर भी तूने दिया अभय का दान
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान्

धुप में छाया जैसे,
प्यास में दरिया जैसे
तन में जीवन जैसे,
मन में दर्पण जैसे,
हाथ दुआओं वाले रोशन करे उजाले,
फूल पे जैसे शबनम, सांस में जैसे सरगम,
प्रेम की मूरत दया की सूरत ,
ऐसे और कहाँ है ,जैसी मेरी माँ है।
जब भी अँधेरा छा जाये
वोह दीपक बन जाए ,
जब इक अकेली रात सताए,
वोह सपना बन जाए,
अन्दर नीर बहाए ,
बाहर से मुस्काए,
काया वोह पावन सी,मथुरा-वृन्दावन जैसी,
जिसके दर्शन में हो भगवन ,
ऐसी और कहाँ है,जैसी मेरी माँ है

है माँ…..
हमारे हर मर्ज की दवा होती है माँ….
कभी डाँटती है हमें, तो कभी गले लगा लेती है माँ…..
हमारी आँखोँ के आंसू, अपनी आँखोँ मेँ समा लेती है माँ…..
अपने होठोँ की हँसी, हम पर लुटा देती है माँ……
हमारी खुशियोँ मेँ शामिल होकर, अपने गम भुला देती है माँ….
जब भी कभी ठोकर लगे, तो हमें तुरंत याद आती है माँ…..
दुनिया की तपिश में, हमें आँचल की शीतल छाया देती है माँ…..
खुद चाहे कितनी थकी हो, हमें देखकर अपनी थकान भूल जाती है माँ….
प्यार भरे हाथोँ से, हमेशा हमारी थकान मिटाती है माँ…..
बात जब भी हो लजीज खाने की, तो हमें याद आती है माँ……
रिश्तों को खूबसूरती से निभाना सिखाती है माँ…….
लब्जोँ मेँ जिसे बयाँ नहीँ किया जा सके ऐसी होती है माँ…….
भगवान भी जिसकी ममता के आगे झुक जाते हैँ

मेरे सर्वस्व की पहचान
अपने आँचल की दे छाँव
ममता की वो लोरी गाती
मेरे सपनों को सहलाती
गाती रहती, मुस्कराती जो
वो है मेरी माँ।
प्यार समेटे सीने में जो
सागर सारा अश्कों में जो
हर आहट पर मुड़ आती जो
वो है मेरी माँ।
दुख मेरे को समेट जाती
सुख की खुशबू बिखेर जाती
ममता की रस बरसाती जो
वो है मेरी माँ।

 Maa Kavita in Hindi

 बोलती नहीं,
याद रखती है हर टूटा सपना।
नहीं चाहती कि
उसकी बेटी को भी पड़े
उसी की तरह
आग में तपना।
माँ जानती है
जिन्दगी कि बगिया में
फूल कम – शूल अधिक हैं,
उसे यह भी ज्ञात है कि
समय सदा साथ नहीं देता।
वह अपनी राजदुलारी को
रखना चाहती है महफूज़
नहीं चाहती कि
उस जान से ज्यादा
अज़ीज़ बेटी पर
कभी भी उठे उँगली।
इसलिए वह
भीतर से
नर्म होते हुए भी
ऊपर से
दिखती है कठोर।
जैसे रात की सियाही
छिपाए रहती 

   बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ ,
याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे ,
आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ
चिड़ियों के चहकार में गूँजे राधा-मोहन अली-अली ,
मुर्गे की आवाज़ से खुलती, घर की कुंड़ी जैसी माँ
बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सब में ,
दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी माँ
बाँट के अपना चेहरा, माथा, आँखें जाने कहाँ गई ,
फटे पुराने इक अलबम में चंचल लड़की
अपने आंचल की छाओं में,
छिपा लेती है हर दुःख से वोह
एक दुआ दे दे तो
काम सारे पूरे हों…
अदृश्य है भगवान,
ऐसा कहते है जो…
कहीं ना कहीं एक सत्य से,
अपरिचित होते है वोह…
खुद रोकर भी हमें
हसाती है वोह…
हर सलीका हमें
सिखलाती है वोह…
परेशानी हो चाहे जितनी भी,
हमारे लिए मुस्कुराती है वोह…
हमारी खुशियों की खातिर
दुखो को भी गले लगाती है वो…
हम निभाएं ना निभाएं
अपना हर फ़र्ज़ निभाती है वोह…
हमने देखा जो सपना
सच उसे बनती है वो…
दुःख के बादल जो छाये हमपर
तो धुप सी खिल जाती है वोह…
ज़िन्दगी की हर रेस में
हमारा होसला बढाती है वोह…
हमारी आँखों से पढ़ लेती है
तकलीफ और उसे मिटाती है वोह…
पर अपनी तकलीफ कभी नही जताती है वोह…

I
अम्बर की ऊंचाई, धरती की ये गहराई
तेरे मुंह में है समाई, माई ओ माई,
तेरा मन अमृत का प्याला, येही काबा येही शेवाला
तेरी ममता पावन दाई, माई ओ माई,
जी चाहे तेरे साथ रहूँ मैं बनके तेरा हमजोली
तेरे पास ना आऊं छुप जाऊं, यूँ खेलूं आँख मिचोली,
परियों की कहानी सुना के, कोई मीठी लोरी गा के
कर दे सपने सुखदाई, माई ओ माई,
संसार के ताने बाने से घबराता है मन मेरा
इन झूठे रिश्ते नातों में, बस प्यार है सच्चा तेरा,
सब दुःख सुख में ढल जाएँ तेरी बाहें जो मिल जाएँ
मिल जाये मुझे खुदाई, माई ओ माई,
फिर कोई शरारत हो मुझसे नाराज करूँ फिर तुझको
फिर गल पे थापी मार के सीने से लगा ले मुझ को,
बचपन की प्यास बुझा दे अपने हाथ से खिला दे
पल्लू में बंधी मिठाई, माई ओ माई

माँ भगवान का दूसरा रूप
उनके लिए दे देंगे जान
हमको मिलता जीवन उनसे
कदमो में है स्वर्ग बसा
संस्कार वह हमे बतलाती
अच्छा बुरा हमे बतलाती
हमारी गलतियों को सुधारती
प्यार वह हमपर बरसती.
तबियत अगर हो जाए खराब
रात-रात भर जागते रहना
माँ बिन जीवन है अधुरा
खाली-खाली सुना-सुना
खाना पहले हमे खिलाती
बादमे वह खुद खाती
हमारी ख़ुशी में खुश हो जाती
दुःख में हमारी आँसू बहाती
कितने खुश नसीब है हम
पास हमारे है माँ
होते बदनसीब वो कितने
जिनके पास ना माँहो

MAA KI MAMTA

माँ की ममता करुणा न्यारी,
जैसे दया की चादर
शक्ति देती नित हम सबको,
बन अमृत की गागर
साया बन कर साथ निभाती,
चोट न लगने देती
पीड़ा अपने उपर ले लेती,
सदा सदा सुख देती
माँ का आँचल सब खुशियों की,
रंगा रंग फुलवारी
इसके चरणों में जन्नत है,
आनन्द की किलकारी
अदभुत माँ का रूप सलोना,
बिलकुल रब के जैसा
प्रेम के सागर सा लहराता,
इसका अपनापन ऐसा….

प्यारी माँ पर आधारित कविता

MAA PAR KAVITA

माँ
तुम्हारी लोरी नहीं सुनी मैंने,
कभी गाई होगी
याद नहीं
फिर भी जाने कैसे
मेरे कंठ से
तुम झरती हो।
तुम्हारी बंद आँखों के सपने
क्या रहे होंगे
नहीं पता
किंतु मैं
खुली आँखों
उन्हें देखता हूँ ।
मेरा मस्तक
सूँघा अवश्य होगा तुमने
मेरी माँ !
ध्यान नहीं पड़ता
परंतु
मेरे रोम-रोम से
तुम्हारी कस्तूरी फूटती है ।
तुम्हारा ममत्व
भरा होगा लबालब
मोह से,
मेरी जीवनासक्ति
यही बताती है ।
और
माँ !
तुमने कई बार
छुपा-छुपी में
ढूंढ निकाला होगा मुझे
पर मुझे
सदा की
तुम्हारी छुपा-छुपी
बहुत रुलाती है;
बहुत-बहुत रुलाती है;

MAA KE UPAR KAVITA IN HINDI
हम जुगनू थे हम तितली थे
हम रंग बिरंगे पंछी थे
कुछ महो-साल की जन्नत में
माँ हम दोनों भी सांझी थे
में छोटा सा इक बच्चा था
तेरी ऊँगली थाम के चलता था
तू दूर नजर से होती थी
में आंसू आंसू रोता था
इक ख्वाबों का रोशन बस्ता
तू रोज मुझे पहनाती थी
जब डरता था में रातों में
तू अपने साथ सुलाती थी
माँ तुने कितने बरसों तक
इस फूल को सींचा हाथों से
जीवन के गहरे भेदों को
में समझा तेरी बातों से
मैं तेरे हाथ के तकिए पर
अब भी रात को सोता हूँ
माँ में छोटा सा इक बच्चा
तेरी याद में अब भी रोता हूँ

KAVITA ON MAA IN HINDI FONT
आज मेरा फिर से मुस्कुराने का मन किया।
माँ की ऊँगली पकड़कर घूमने जाने का मन किया॥
उंगलियाँ पकड़कर माँ ने मेरी मुझे चलना सिखाया है।
खुद गीले में सोकर माँ ने मुझे सूखे बिस्तर पे सुलाया है॥
माँ की गोद में सोने को फिर से जी चाहता है।
हाथो से माँ के खाना खाने का जी चाहता है॥
लगाकर सीने से माँ ने मेरी मुझको दूध पिलाया है।
रोने और चिल्लाने पर बड़े प्यार से चुप कराया है॥
मेरी तकलीफ में मुझ से ज्यादा मेरी माँ ही रोयी है।
खिला-पिला के मुझको माँ मेरी, कभी भूखे पेट भी सोयी है॥
कभी खिलौनों से खिलाया है, कभी आँचल में छुपाया है।
गलतियाँ करने पर भी माँ ने मुझे हमेशा प्यार से समझाया है॥
माँ के चरणो में मुझको जन्नत नजर आती है।
लेकिन माँ मेरी मुझको हमेशा अपने सीने से लगाती है॥

+माँ केलिए   कविता +

चुपके चुपके मन ही मन में
खुद को रोते देख रहा हूँ
बेबस होके अपनी माँ को
बूढ़ा होते देख रहा हूँ
रचा है बचपन की आँखों में
खिला खिला सा माँ का रूप
जैसे जाड़े के मौसम में
नरम गरम मखमल सी धूप
धीरे धीरे सपनों के इस
रूप को खोते देख रहा हूँ
बेबस होके अपनी माँ को
बूढ़ा होता देख रहा हूँ………
छूट छूट गया है धीरे धीरे
माँ के हाथ का खाना भी
छीन लिया है वक्त ने उसकी
बातों भरा खजाना भी
घर की मालकिन को
घर के कोने में सोते देख रहा हूँ
चुपके चुपके मन ही मन में
खुद को रोते देख रहा हूँ………
बेबस होके अपनी माँ को
बूढ़ा होता देख रहा हूँ…..

सहृदय से सभी मताओ को समर्पित

 सत्य नारायण गुप्ता भोजवाल

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

जीवन एक प्रतिध्वनि है

एक बार की बात है एक शहर में एक बहुत धनवान सेठ की दुकान थी जो शहर में सबसे अधिक चलती थी। उसकी दुकान पर हर तरह का सामान मिलता था इसलिए दुकान पर हर समय ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी।
उस दुकान पर एक छोटा सा व्यापारी सेठ को मक्खन सप्लाई करता था जो कि एक गोल पेढ़े के आकार का आता था और प्रत्येक पेढ़े का वजन एक किलोग्राम था। वह जितने पेढ़े सेठ को देता था उसके मूल्य के बदले घर की जरूरत में आने वाले सामान जैसे चीनी, चावल, दालें इत्यादि ले जाता था। यह सिलसिला वर्षों से चलता आ रहा था और दोनो एक दूसरे पर पूर्ण विश्वास रखते थे।
एक दिन वह व्यापारी उस सेठ को मक्खन के 50 पेढ़े अर्थात 50 कि.ग्रा. मक्खन देकर गया। सेठ उस पेढ़ो को एक बड़े फ्रिज में रखता जा रहा था। पेढ़े रखते-रखते सेठ के मन मे विचार आया कि क्यों न एक पेढ़े का वजन जांच कर लिया जाये। सेठ ने एक पेढ़ा तराजू पर रखा था उसका वजन 900 ग्राम निकला। सेठ ने दूसरे पेढ़े को तराजू पर रखा उसका वजन भी 900 ग्राम निकला। सेठ को क्रोध आ गया और उसने सभी पेढ़ो का वजन करवाया। उसके आश्चर्य की सीमा ही न रही जब सब पेढ़े 900 ग्राम के ही निकले।
अब सेठ आपे से बाहर हो गया। उसने तुरन्त उस व्यापारी को बुलावा भेजा। व्यापारी आया तो सेठ ने उसे पेढ़ो का वजन करके दिखाया और खूब भरा-बुला कला। उस व्यापारी को कहा गया कि वह ईमानदार नहीं है और उसमें बेईमानी कूट-कूट कर भरी हुई है। उसे यह पाठ भी पढाया गया कि व्यापारी को ईमानदार होना चाहिए।
छोटे व्यापारी ने हाथ जोड़कर बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया कि ‘सेठ जी, मैं एक बहुत छोटा व्यापारी हूँ और मेरे पास बाट खरीदने के लिए भी पैसे नहीं थे इसलिए जब आपकी दुकान से मैं घर के लिए जरूरत का सामान खरीदता था तो सामान का एक पैकेट जो कि 1 किलोग्राम का होता था, उसे तराजू के एक तरफ बाट के स्थान पर रखकर दूसरे स्थान पर उतने ही भार के अनुसार मक्खन को रखकर तौल कर एक पेढ़ा बनाता था जो आपको सप्लाई करता था।’
सेठ को अपनी करनी समझ में आ गई। उसे अपने आप पर शर्म आने लगी थी। सेठ को सही गलत का फर्क महसूस हो गया था। वह मन ही मन सोच रहा था कि बेईमान तो वह है न कि वह छोटा गरीब व्यापारी। उसे ही अपने व्यापार में ईमानदारी रखनी चाहिए थी।
ज्ञानी लोग सही कहते हैं कि जीवन एक प्रतिध्वनि है जो हम अच्छा या बुरा इस संसार को देते हैं कुछ समय बाद वही हमें प्रतिध्वनि के रूप में हमारे पास वापिस आ जाता है। सत्य ही है कि हम दूसरों के लिए जो अच्छा ) या बुरा सोचते या करते हैं, हू-ब-हू वही हमें किसी न किसी तरह वापिस मिल ही जाता है।

सोमवार, 13 जुलाई 2020

गणेश विवाह

गणेश के विवाह का रहस्य

भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र गणेश जी की पूजा सभी भगवानों से पहले की जाती है| प्रत्येक शुभ कार्य करने से पहले इन्हे ही पूजा जाता है| गणेश जी को गणपति के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह गणों के देवता है और इनका वाहन एक मूषक होता है| ज्योतिषी विद्या में गणेश जी को केतु के देवता कहा गया है|

गणेश जी के शरीर की रचना माता पार्वती द्वारा की गई थी| उस समय उनका मुख सामान्य था, बिल्कुल वैसा जैसा किसी मनुष्य का होता है|

एक समय की बात है माता पार्वती ने गणेश को आदेश दिया कि उन्हें घर की पहरेदारी करनी होगी क्योंकि माता पार्वती स्नानघर जा रही थी| गणेश जी को आदेश मिला की जब तक पार्वती माता स्नान कर रही है घर के अंदर कोई न आए|

तभी दरवाज़े पर भगवान शंकर आए और गणेश ने उन्हें अपने ही घर में प्रवेश करने से मना कर दिया, जिसके कारण शिव जी ने गणेश का सर धड़ से अलग कर दिया| गणेश को ऐसे देख माता पार्वती दुखी हो गई| तब शिव ने पार्वती के दुख को दूर करने के लिए गणेश को जीवित कर उनके धड़ पर हाथी का सिर लगा दिया और उन्हें प्रथम पूज्य का वरदान दिया|

किस कारण से नहीं हुआ गणेश जी का विवाह

गणेश जी के दो दन्त भी थे जो उनके हाथी वाले सिर की सुंदरता बढ़ाते थे| किन्तु परशुराम के साथ युद्ध करने के कारण गणेशजी का एक दांत टूट गया था| तब से वे एकदंत कहलाए जाते है|

दो कारणों की वजह से गणेश जी का विवाह नहीं हो पा रहा था| उनसे कोई भी सुशील कन्या विवाह के लिए तैयार नहीं होती थी| पहला कारण उनका सिर हाथी वाला था और दूसरा कारण उनका एक दन्त| इसी कारणवश गणेशजी नाराज रहते थे|

गणेश जी का विवाह किस से और कैसे हुआ

जब भी गणेश किसी अन्य देवता के विवाह में जाते थे तो उनके मन को बहुत ठेस पहुँचती थी| उन्हें ऐसा लगा कि अगर उनका विवाह नहीं हो पा रहा तो वे किसी और का विवाह कैसे होने दें सकते है| तो उन्होंने अन्य देवताओं के विवाह में बाधाएं डालना शुरू कर दिया|

इस काम में गणेश जी की सहायता उनका वाहन मूषक करता था| वह मूषक गणेश जी के आदेश का पालन कर विवाह के मंडप को नष्ट कर देता था जिससे विवाह के कार्य में रूकावट आती थी| गणेश और चूहे की मिली भगत से सारे देवता परेशान हो गए और शिवजी को जाकर अपनी गाथा सुनाने लगे| परन्तु इस समस्या का हल शिवजी के पास भी नहीं था| तो शिव-पार्वती ने उन्हें बोला कि इस समस्या का निवारण ब्रह्मा जी कर सकते है|

यह सुनकर सब देवतागण ब्रह्मा जी के पास गए, तब ब्रह्माजी योग में लीन थे| कुछ देर बाद देवताओं के समाधान के लिए योग से दो कन्याएं ऋद्धि और सिद्धि प्रकट हुई| दोनों ब्रह्माजी की मानस पुत्री थीं|दोनों पुत्रियों को लेकर ब्रह्माजी गणेशजी के पास पहुंचे और बोले की आपको इन्हे शिक्षा देनी है|

गणेशजी शिक्षा देने के लिए तैयार हो गए| जब भी चूहे द्वारा गणेश जी के पास किसी के विवाह की सूचना अति थी तो ऋद्धि और सिद्धि उनका ध्यान भटकाने के लिए कोई न कोई प्रसंग छेड़ देतीं थी| ऐसा करने से हर विवाह बिना किसी बाधा के पूर्ण हो जाता था|

परन्तु एक दिन गणेश जी को सारी बात समझ में आई जब चूहे ने उन्हें देवताओं के विवाह बिना किसी रूकावट के सम्पूर्ण होने के बारे में बताया| इससे पहले कि गणेश जी क्रोधित होते, ब्रह्मा जी उनके सामने ऋद्धि सिद्धि को लेकर प्रकट हुए और बोलने लगे कि मुझे इनके लिए कोई योग्य वर नहीं मिल रहा है| कृपया आप इनसे विवाह कर लें|

इस प्रकार गणेश जी का विवाह बड़ी धूमधाम से ऋद्धि और सिद्धि के साथ हुआ और इसके बाद इन्हे दो पुत्रों की प्राप्ति हुई जिनका नाम था शुभ और लाभ|

कैसे पडा हनुमान जी का नाम

हनुमान जी का नाम कैसे पड़ा

राम भक्त हनुमान के बारे में कौन नहीं जानता। उनकी महिमा अपरमपार है। लेकिन क्या आपको पता है की भगवान बजरंगबली का नाम हनुमान क्यों रखा गया। दरअसल इसके पीछे एक बेहद अनोखा कारण है।

इस कारण रखा गया बजरंग बली का नाम हनुमान

यह तब की बात है जब हनुमान जी छोटे थे। रामायण के अनुसार हनुमान जी का एक नाम बजरंग बली भी है। यह नाम उनके पिता केसरी ने रखा था। जब हनुमान जी छोटे थे तो वह बेहद नटखट थे। एक बार उन्होंने खेल - खेल में सूर्य भगवान को अपने मुंह में ले लिया था। जिसकी वजह से चारों और अंधेरा छा गया था। जब इस बात की खबर स्वर्ग देवराज इंद्र को पता लगी तो वह बेहद गुस्सा हुए। और गुस्से में आकर उन्होंने अपने वज्र से हनुमान जी की ठोढ़ी पर प्रहार किया जिसके चलते वह टुट गई। ठोढ़ी को वैसे संस्कृत में हनु भी कहा जाता है। इस घटना के बाद से ही राम भक्त बजरंगबली का नाम हनुमान रखा गया था।

क्यों हुए श्री राम भक्त हनुमान सिंदूरी

हर कोई यह जानता है कि हनुमान जी श्री राम जी के बहुत बड़े भक्त है। क्या आपको पता है कि श्री राम जी की वजह से ही हनुमान जी सिंदूरी रंग के हो गए थे। दरअसल, जब भगवान श्री राम रावण को मारकर अयोध्या आ रहे थे। तब हनुमान जी ने भी भगवान श्री राम जी के साथ आने की इच्छा जताई। राम जी के बहुत समझने पर भी वह नहीं मानें और उनके साथ अय़ोध्या आ गए। बजरंग बली भगवान हमेशा से ही राम जी की सेवा करके अपना जीवन बिताना चाहते थे। एक बार उन्होंने माता सीता को मांग में सिंदूर भरते हुए देखा था।

तो हनुमान जी ने इससे संबंधित सवाल सीता जी पहुंच ही लिया। इस पर माता सीता ने कहा कि वह प्रभु राम को प्रसन्न करने के लिए सिंदूर लगाती है। फिर क्या था इतना सुनने भर से ही हनुमान जी ने सिंदूर का एक बड़ा बक्सा लिया और अपने ऊपर उड़ेल लिया और साधी राम जी के पास चले गए। हनुमान जी को सिंदूर में लिपटा देख राम जी हैरानी में पड़ गए। जब उन्होंने हनुमान जी से ऐसा करने का कारण पहुंचा तो उन्होंने बताया कि सिंदूर लगाने पर आप जैसे माता सीता से प्रसन्न रहते है तो अब आप मुझसे भी उतने ही प्रसन्न रहना। तब श्री राम को अपने भोले-भाले भक्त हनुमान की युक्ति पर बहुत हंसी आई और सचमुच हनुमान के लिए श्री राम के मन में जगह और गहरी हो गई।

रावन का इतिहास

रावण का जन्म और नामकरण

लोग लंकापति रावण को अनीति, अनाचार, दंभ, काम, क्रोध, लोभ, अधर्म और बुराई का प्रतीक मानते हैं और उससे घृणा करते हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यहां यह है कि दशानन रावण में कितना ही राक्षसत्व क्यों न हो उसके गुणों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

रावण में अवगुण की अपेक्षा गुण अधिक थे। रावण एक प्रकांड विद्वान था। वेद-शास्त्रों पर उसकी अच्छी पकड़ थी और वह भगवान भोलेशंकर का अनन्य भक्त था। उसे तंत्र, मंत्र, सिद्धियों तथा कई गूढ़ विद्याओं का ज्ञान था। ज्योतिष विद्या में भी उसे महारथ हासिल थी।

रावण के जन्म का रहस्य -

रावण के उदय के विषय में भिन्न-भिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न प्रकार के उल्लेख मिलते हैं। वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण महाकाव्य,पद्मपुराण तथा श्रीमद्‍भागवत पुराण के अनुसार हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकशिपु दूसरे जन्म में रावण और कुंभकर्ण के रूप में पैदा हुए।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण पुलस्त्य मुनि का पोता था अर्थात् उनके पुत्र विश्वश्रवा का पुत्र था। विश्वश्रवा की वरवर्णिनी और कैकसी नामक दो पत्नियां थी। वरवर्णिनी के कुबेर को जन्म देने पर सौतिया डाह वश कैकसी ने अशुभ समय में गर्भ धारण किया।

इसी कारण से उसके गर्भ से रावण तथा कुंभकर्ण जैसे क्रूर स्वभाव वाले भयंकर राक्षस उत्पन्न हुए। तुलसीदास जी के रामचरितमानस में रावण का जन्म शाप के कारण हुआ है। वे नारद एवं प्रतापभानु की कथाओं को रावण के जन्म का कारण बताते हैं।

पौराणिक कथा-

इसके अनुसार भगवान विष्णु के दर्शन हेतु सनक, सनंदन आदि ऋषि बैकुंठ पधारे परंतु भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें प्रवेश देने से इंकार कर दिया। ऋषिगण अप्रसन्न हो गए और क्रोध में आकर जय-विजय को शाप दे दिया कि तुम राक्षस हो जाओ। जय-विजय ने प्रार्थना की व अपराध के लिए क्षमा मांगी।

भगवान विष्णु ने भी ऋषियों से क्षमा करने को कहा। तब ऋषियों ने अपने शाप की तीव्रता कम की और कहा कि तीन जन्मों तक तो तुम्हें राक्षस योनि में रहना पड़ेगा और उसके बाद तुम पुनः इस पद पर प्रतिष्ठित हो सकोगे। इसके साथ एक और शर्त थी कि भगवान विष्णु या उनके किसी अवतारी स्वरूप के हाथों तुम्हारा मरना अनिवार्य होगा।
यह शाप राक्षसराज, लंकापति, दशानन रावण के जन्म की आदि गाथा है। भगवान विष्णु के ये द्वारपाल पहले जन्म में हिरण्याक्ष व हिरण्यकशिपु राक्षसों के रूप में जन्मे। हिरण्याक्ष राक्षस बहुत शक्तिशाली था और उसने पृथ्वी को उठाकर पाताललोक में पहुंचा दिया था।

पृथ्वी की पवित्रता बहाल करने के लिए भगवान विष्णु को वराह अवतार धारण करना पड़ा था। फिर विष्णु ने हिरण्याक्ष का वधकर पृथ्वी को मुक्त कराया था।
हिरण्यकशिपु भी ताकतवर राक्षस था और उसने वरदान प्राप्तकर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया था। भगवान विष्णु द्वारा अपने भाई हिरण्याक्ष का वध करने की वजह से हिरण्यकशिपु विष्णु विरोधी था और अपने विष्णुभक्त पुत्र प्रह्लाद को मरवाने के लिए भी उसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

फिर भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकशिपु का वध किया था। त्रेतायुग में ये दोनों भाई रावण और कुंभकर्ण के रूप में पैदा हुए और तीसरे जन्म में द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया, तब ये दोनों शिशुपाल व दंतवक्त्र नाम के अनाचारी के रूप में पैदा हुए थे।

क्यों पड़ा रावण का दशानन नाम-

रावण को दशानन कहते हैं। उसका नाम दशानन उसके दशग्रीव नाम पर पड़ा। कहते हैं कि महातपस्वी रावण ने भगवान शंकर को एक-एक कर अपने दस सिर अर्जित किए थे।

उस कठोर तपस्या के बल पर ही उसे दस सिर प्राप्त हुए, जिन्हें लंका युद्ध में भगवान राम ने अपने बाणों से एक-एक कर काटा था।

यदि रावण ने कठोर तपस्या से अर्जित अपने उन दस सिरों की बुद्धि का सार्थक और सही इस्तेमाल किया होता,तो शायद इतिहास में अपनी प्रकांड विद्वता के लिए अमर हो जाता और लोग उससे घृणा नहीं करते, बल्कि उसकी पूजा करते।

गणेश जन्म उत्सव🎉🎊🎁

श्री गणेश जी के जन्म की कहानी

श्रीगणेश के जन्म की कथा भी निराली है। वराहपुराण के अनुसार भगवान शिव पंचतत्वों से बड़ी तल्लीनता से गणेश का निर्माण कर रहे थे। इस कारण गणेश अत्यंत रूपवान व विशिष्ट बन रहे थे। आकर्षण का केंद्र बन जाने के भय से सारे देवताओं में खलबली मच गई। इस भय को भांप शिवजी ने बालक गणेश का पेट बड़ा कर दिया और सिर को गज का रूप दे दिया।

दूसरी कथा शिवपुराण से है। इसके मुताबिक देवी पार्वती ने अपने उबटन से एक पुतला बनाया और उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने इस प्राणी को द्वारपाल बना कर बैठा दिया और किसी को भी अंदर न आने देने का आदेश देते हुए स्नान करने चली गईं। संयोग से इसी दौरान भगवान शिव वहां आए। उन्होंने अंदर जाना चाहा, लेकिन बालक गणेश ने रोक दिया। नाराज शिवजी ने बालक गणेश को समझाया, लेकिन उन्होंने एक न सुनी।

क्रोधित शिवजी ने त्रिशूल से गणेश का सिर काट दिया। पार्वती को जब पता चला कि शिव ने गणेश का सिर काट दिया है, तो वे कुपित हुईं। पार्वती की नाराजगी दूर करने के लिए शिवजी ने गणेश के धड़ पर हाथी का मस्तक लगा कर जीवनदान दे दिया। तभी से शिवजी ने उन्हें तमाम सामर्थ्य और शक्तियां प्रदान करते हुए प्रथम पूज्य और गणों का देव बनाया।

गणेश के पास हाथी का सिर, मोटा पेट और चूहा जैसा छोटा वाहन है, लेकिन इन समस्याओं के बाद भी वे विघ्नविनाशक, संकटमोचक की उपाधियों से नवाजे गए हैं। कारण यह है कि उन्होंने अपनी कमियों को कभी अपना नकारात्मक पक्ष नहीं बनने दिया, बल्कि अपनी ताकत बनाया। उनकी टेढ़ी-मेढ़ी सूंड बताती है कि सफलता का पथ सीधा नहीं है।

यहां दाएं-बाएं खोज करने पर ही सफलता और सच प्राप्त होगा। हाथी की भांति चाल भले ही धीमी हो, लेकिन अपना पथ अपना लक्ष्य न भूलें। उनकी आंखें छोटी लेकिन पैनी है, यानी चीजों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करना चाहिए। कान बड़े है यानी एक अच्छे श्रोता का गुण हम सबमें हमेशा होना चाहिए।

राम-सीता का विवाहराम-सीता का विवाह जय श्री राम

राम-सीता का विवाह

श्रीरामचरितमानस के अनुसार- महाराजा जनक ने सीता के विवाह हेतु स्वयंवर रचाया। सीता के स्वयंवर में आए सभी राजा-महाराजा जब भगवान शिव का धनुष नहीं उठा सकें, तब ऋषि विश्वामित्र ने प्रभु श्रीराम से आज्ञा देते हुए कहा- हे राम! उठो, शिवजी का धनुष तोड़ो और जनक का संताप मिटाओ।

गुरु विश्वामित्र के वचन सुनकर श्रीराम तत्पर उठे और धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए आगे बढ़ें। यह दृश्य देखकर सीता के मन में उल्लास छा गया। प्रभु की ओर देखकर सीताजी ने मन ही मन निश्चय किया कि यह शरीर इन्हीं का होकर रहेगा या तो रहेगा ही नहीं।

माता सीता के मन की बात प्रभु श्रीराम जान गए और उन्होंने देखते ही देखते भगवान शिव का महान धनुष उठाया। इसके बाद उस पर प्रत्यंचा चढ़ाते ही एक भयंकर ध्वनि के साथ धनुष टूट गया। यह देखकर सीता के मन को संतोष हुआ।

फिर सीता श्रीराम के निकट आईं। सखियों के बीच में जनकपुत्री सीता ऐसी शोभित हो रही थ‍ी, जैसे बहुत-सी छबियों के बीच में महाछबि हो। तब एक सखी ने सीता से जयमाला पहनाने को कहा। उस समय उनके हाथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो डंडियोंसहित दो कमल चंद्रमा को डरते हुए जयमाला दे रहे हो। तब सीताजी ने श्रीराम के गले में जयमाला पहना दी। यह दृश्य देखकर देवता फूल बरसाने लगे। नगर और आकाश में बाजे बजने लगे।

श्रीराम-सीता की जोड़ी इस प्रकार सुशोभित हो रही थी, मानो सुंदरता और श्रृंगार रस एकत्र हो गए हो। पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग में यश फैल गया कि श्रीराम ने धनुष तोड़ दिया और सीताजी का वरण कर लिया। इसी के मद्देनजर प्रतिवर्ष अगहन मास की शुक्ल पंचमी को प्रमुख राम मंदिरों में विशेष उत्सव मनाया जाता है।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम-सीता के शुभ विवाह के कारण ही यह दिन अत्यंत पवित्र माना जाता है। भारतीय संस्कृति में राम-सीता आदर्श दम्पत्ति माने गए हैं।

जिस प्रकार प्रभु श्रीराम ने सदा मर्यादा पालन करके पुरुषोत्तम का पद पाया, उसी तरह माता सीता ने सारे संसार के समक्ष पतिव्रता स्त्री होने का सर्वोपरि उदाहरण प्रस्तुत किया। इस पावन दिन सभी को राम-सीता की आराधना करते हुए अपने सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए प्रभु से आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

माता दुर्गा के रहस्य

मां दुर्गा के पांच रहस्य

हिन्दू धर्म में माता रानी का देवियों में सर्वोच्च स्थान है। उन्हें अम्बे, जगदम्बे, शेरावाली, पहाड़ावाली आदि नामों से पुकारा जाता है। संपूर्ण भारत भूमि पर उनके सैंकड़ों मंदिर है।

कैसे हुआ देवी का जन्म ?

देवी का जन्म सबसे पहले दुर्गा के रूप में ही माना जाता है जिसे राक्षस महिषासुर का वध करने के लिए जन्म दिया गया था और यही कारण है कि उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार देवताओं को भगा कर महिषासुर ने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था तब सभी देवता मिलकर त्रिमूर्ती के पास गए थे. ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने अपने शरीर की ऊर्जा से एक आकृति बनाई और सभी देवताओं ने अपनी शक्तियां उस आकृति में डाली. इसीलिए दुर्गा को शक्ति भी कहा जाता है. दुर्गा की छवि बेहद सौम्य और आकर्षक थी और उनके कई हाथ थे.

क्योंकि सभी देवताओं ने मिलकर उन्हें शक्ति दी इसलिए वो सबसे ताकतवर भगवान मानी जाती हैं. उन्हें शिव का त्रिशूल मिला, विष्णु का चक्र, बह्मा का कमल, वायु देव से उन्हें नाक मिली, हिमावंत (पर्वतों के देवता) से कपड़े, धनुष और शेर मिला और ऐसे एक-एक कर शक्तियों से वो दुर्गा बनी और युद्ध के लिए तैयार हुईं.

दुर्गा की शक्तियों के बारे में रिगवेद के श्लोक 10.125.1 से लेकर 10.125.8 तक देवी सूक्त: में पढ़ा जा सकता है.

आखिर पूजा 9 दिन ही क्यों की जाती है?

जब दुर्गा या देवी ने महिषासुर पर हमला किया और एक-एक कर दैत्यों को मारना शुरू किया तब भैंसे का रूप धारण करने वाले महिषासुर को मारने के लिए उन्हें 9 दिन लगे. इसलिए नवरात्रि को 9 दिन मनाया जाता है. इससे जुड़ी अन्य कथाएं भी हैं जैसे नवरात्रि को दुर्गा के 9 रूपों से जोड़कर देखा जाता है और कहते हैं कि हर दिन युद्ध में देवी ने अलग रूप लिया था और इसलिए 9 दिन 9 अलग-अलग देवियों की पूजा की जाती है. हर दिन को अलग रंग से जोड़कर भी देखा जाता है.

क्यों है अष्ट भुजाओं वाली?

देवी दुर्गा को अष्ट भुजाओं वाली कहा जाता है. कुछ शास्त्रों में 10 भुजाओं वाला भी कहा जाता है. वास्तु शास्त्र में 8 अहम दिशाएं होती हैं, लेकिन कई जगहों पर 10 कोण या दिशाओं की बात की जाती है. इनमें हैं प्राची (पूर्व), प्रतीची (पश्चिम), उदीची (उत्तर), अवाचि (दक्षिण), ईशान (नॉर्थ ईस्ट), अग्निया (साउथ ईस्ट), नैऋत्य (साउथ वेस्ट), वायु (नॉर्थ वेस्ट), ऊर्ध्व (आकाश की ओर), अधरस्त (पाताल की ओर). कई जगह 8 दिशाएं ही मानी जाती हैं क्योंकि आकाश और पाताल की ओर को दिशा का दर्जा नहीं दिया जाता. हिंदू शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना गया है कि देवी दुर्गा हर दिशा से अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और यही कारण है कि उनकी 8 भुजाएं हैं जो आठों दिशाओं में काम करती हैं.

शेर की सवारी ही क्यों ?

देवी को शेर पर सवार बताया जाता है. दुर्गा का वाहन शेर है और इसे अतुल्य शक्ति से जोड़कर देखा जाता है. ऐसा माना जाता है कि शेर पर सवार होकर दुर्गा मां दुख और बुराई का अंत करती हैं.

दुर्गा को त्रयंबके क्यों कहा जाता है?

दुर्गा को त्रयंबके कहा जाता है यानी तीन आखों वाली. शिव भी त्रिनेत्र कहलाएं हैं जिनकी तीन आखें थी. दुर्गा को शिव का ही आधा रूप माना जाता है जिसे शक्ति भी कहा जाता है. दुर्गा की तीन आखें अग्नि, सूर्य और चंद्र का प्रतीक मानी जाती हैं.

दुर्गा की पूजा के लिए 108 मंत्रों का जाप क्यों होता है?

नवरात्रि को दुर्गा पूजा के नाम से भी जाना जाता है. कहा जाता है कि भगवान राम ने मां दुर्गा की पूजा की थी जिन्हें राम ने महिषासुर मर्दिनी के नाम से ही संबोधित किया था. ये पूजा रावण से युद्ध करने के पूर्व की गई थी और इसीलिए दशहरा नवरात्रि के अंत में मनाया जाता है जिस दिन रावण का वध हुआ था. माना जाता है कि राम जी ने दुर्गा पूजा के वक्त 108 नीलकमल चढ़ाए थे दुर्गा को और इसलिए ही 108 को शुभ माना जाता है.

सफलता की कहानी

एक सफलता का रहस्य

 एक बार एक नौजवान लड़के ने सुकरात से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या है?
सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल मुझे नदी के किनारे मिलो. वो मिले. फिर सुकरात ने नौजवान से उनके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा.और जब आगे बढ़ते-बढ़ते पानी गले तक पहुँच गया, तभी अचानक सुकरात ने उस लड़के का सर पकड़ के पानी में डुबो दिया ।



लड़का बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा , लेकिन सुकरात ताकतवर थे और उसे तब तक डुबोये रखे जब तक की वो नीला नहीं पड़ने लगा. फिर सुकरात ने उसका सर पानी से बाहर निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो चीज उस लड़के ने सबसे पहले की वो थी हाँफते-हाँफते तेजी से सांस लेना.

सुकरात ने पूछा ,” जब तुम वहाँ थे तो तुम सबसे ज्यादा क्या चाहते थे?”

लड़के ने उत्तर दिया,”सांस लेना”


सुकरात ने कहा,” यही सफलता का रहस्य है. जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना की तुम सांस लेना चाहते थे तो वो तुम्हे मिल जाएगी” इसके आलावा और कोई रहस्य नहीं है.

सफलता का रहस्य

सफलता का रहस्य
एक बार एक नौजवान लड़के ने सुकरात से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या है?
सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल मुझे नदी के किनारे मिलो. वो मिले. फिर सुकरात ने नौजवान से उनके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा.और जब आगे बढ़ते-बढ़ते पानी गले तक पहुँच गया, तभी अचानक सुकरात ने उस लड़के का सर पकड़ के पानी में डुबो दिया ।



लड़का बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा , लेकिन सुकरात ताकतवर थे और उसे तब तक डुबोये रखे जब तक की वो नीला नहीं पड़ने लगा. फिर सुकरात ने उसका सर पानी से बाहर निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो चीज उस लड़के ने सबसे पहले की वो थी हाँफते-हाँफते तेजी से सांस लेना.

सुकरात ने पूछा ,” जब तुम वहाँ थे तो तुम सबसे ज्यादा क्या चाहते थे?”

लड़के ने उत्तर दिया,”सांस लेना”

सुकरात ने कहा,” यही सफलता का रहस्य है. जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना की तुम सांस लेना चाहते थे तो वो तुम्हे मिल जाएगी” इसके आलावा और कोई रहस्य नहीं है.

जीवन में समय की समय की प्राथमिकता

जिंदगी में प्राथमिकता सेट करें


एक बार फिलोसॉफी की क्लास में एक प्रोफेसर प्रवेश करते है। उनके साथ में एक कांच का जार, कुछ पत्थर, कंकड़ और कुछ बालू भी थी। प्रोफेसर के प्रवेश करते ही सभी ने अभिवादन किया। प्रोफेसर ने बताया की आज क्लास में अन्य क्लास की अपेक्षा कुछ खास सीखने को मिलेगा। विद्यार्थी खुश एवं एक्ससिटेड थे, आज कुछ सीखने को मिलेगा।
प्रोफेसर अब खाली ज़ार में पत्थरों को भरना शुरू किया, जब तक जार भर नही गया। जार भरने पर प्रोफेसर ने विद्यार्थियों से पूछा- “क्या जार भर गया”?

सभी ने हाँ में उत्तर दिया। अब प्रोफेसर ने कंकडों को जार में डालना शुरू किया, साथ ही साथ जार को हिलाया भी, जिससे पत्थरों के बीच मे कंकड़ अपना रास्ता आसानी से बना पाए। जब जार भर गया तो दोवारा प्रोफेसर ने विद्यार्थियों से पूछा- “क्या अब जार पूरा भर गया?” इस पर दोबारा विधार्थितो ने हाँ में जवाब दिया।



अब प्रोफेसर ने उसमे बालू के कण डालने आरम्भ किये, बालू के कण अपना रास्ता बनाते हुए उस जार में प्रवेश कर गये। प्रोफेसर के दोबारा पूछने पर विद्यार्थियों में कहा “अब जार पूर्ण रूप से भर गया है”।

ऐसा सुनकर प्रोफेसर ने पानी लेकर उस ज़ार में उड़ेल दिया। वह भी उसमें समा गया। प्रोफेसर ने विद्यार्थियों को समझाते हुए बताया, कि आपको अपने जीवन में प्राथमिकता को सेट करना होगा। जिंदगी भी एक कांच के ज़ार की तरह है, जिसमे सबसे जरूरी पत्थर है, क्योंकि पत्थर से अभिप्राय आपके परिवार, चरित्र और स्वास्थ्य है, जबकि कंकड़ आपकी नौकरी एवं अन्य आवश्यकता है तथा बालू हमारे जीवन की छोटी-छोटी ज़रूरतों का प्रतिनिधित्व करती है।



इसलिए यदि हम अपने जीवन रूपी जार में पहले बालू भर देंगे तो बाकी चीजों के लिए जगह नहीं बचेगी। इसलिए आपके जीवन में जो सबसे ज्यादा जरूरी है, उसे ज्यादा महत्व और 

जिंदगी में प्राथमिकता सेट करें

एक बार फिलोसॉफी की क्लास में एक प्रोफेसर प्रवेश करते है। उनके साथ में एक कांच का जार, कुछ पत्थर, कंकड़ और कुछ बालू भी थी। प्रोफेसर के प्रवेश करते ही सभी ने अभिवादन किया। प्रोफेसर ने बताया की आज क्लास में अन्य क्लास की अपेक्षा कुछ खास सीखने को मिलेगा। विद्यार्थी खुश एवं एक्ससिटेड थे, आज कुछ सीखने को मिलेगा।
प्रोफेसर अब खाली ज़ार में पत्थरों को भरना शुरू किया, जब तक जार भर नही गया। जार भरने पर प्रोफेसर ने विद्यार्थियों से पूछा- “क्या जार भर गया”?

सभी ने हाँ में उत्तर दिया। अब प्रोफेसर ने कंकडों को जार में डालना शुरू किया, साथ ही साथ जार को हिलाया भी, जिससे पत्थरों के बीच मे कंकड़ अपना रास्ता आसानी से बना पाए। जब जार भर गया तो दोवारा प्रोफेसर ने विद्यार्थियों से पूछा- “क्या अब जार पूरा भर गया?” इस पर दोबारा विधार्थितो ने हाँ में जवाब दिया।

अब प्रोफेसर ने उसमे बालू के कण डालने आरम्भ किये, बालू के कण अपना रास्ता बनाते हुए उस जार में प्रवेश कर गये। प्रोफेसर के दोबारा पूछने पर विद्यार्थियों में कहा “अब जार पूर्ण रूप से भर गया है”।

ऐसा सुनकर प्रोफेसर ने पानी लेकर उस ज़ार में उड़ेल दिया। वह भी उसमें समा गया। प्रोफेसर ने विद्यार्थियों को समझाते हुए बताया, कि आपको अपने जीवन में प्राथमिकता को सेट करना होगा। जिंदगी भी एक कांच के ज़ार की तरह है, जिसमे सबसे जरूरी पत्थर है, क्योंकि पत्थर से अभिप्राय आपके परिवार, चरित्र और स्वास्थ्य है, जबकि कंकड़ आपकी नौकरी एवं अन्य आवश्यकता है तथा बालू हमारे जीवन की छोटी-छोटी ज़रूरतों का प्रतिनिधित्व करती है।

इसलिए यदि हम अपने जीवन रूपी जार में पहले बालू भर देंगे तो बाकी चीजों के लिए जगह नहीं बचेगी। इसलिए आपके जीवन में जो सबसे ज्यादा जरूरी है, उसे ज्यादा महत्व और समय दें।

सीख -

जीवन की ज़रूरतों की प्राथमिकता को समझें। जो जीवन के लिए सबसे ज्यादा जरूरी हो, पहले उसी में फोकस करें। समय बचने पर बाकी चीजें बाद में करें। चीजों में संतुलन बनाने में सफल होने वाले ही कामयाब लोग कहलाते हैं। दें।

सीख -
जीवन की ज़रूरतों की प्राथमिकता को समझें। जो जीवन के लिए सबसे ज्यादा जरूरी हो, पहले उसी में फोकस करें। समय बचने पर बाकी चीजें बाद में करें। चीजों में संतुलन बनाने में सफल होने वाले ही कामयाब लोग कहलाते हैं।

भुर्जी जाति का इतिहास

भुर्जी कान्यकुब्जवैश्य वर्ण और  भुर्जी जाति का इतिहास
रिपोर्ट- सत्यनारायण गुप्ता चित्रकूट उत्तर प्रदेश 

कान्यकुब्ज भुर्जी वैश्य वर्ण भुर्जी  जाति
भारत वर्ष के मानवीय भूगोल कर्म प्रधान रहा है । कर्म या व्यवसाय के आधार पर आज भी व्यक्ति व उनका सन्तती सम्बोधित होता है ।

किसी खास कर्म-व्यवसाय में संलिप्त व्यक्ति, परिवार और विस्तारित पारीवारिक संगठनों ने जातीय-संज्ञा प्राप्त की ।

देश, काल और परिस्थिति की धरातल पर सम्पूर्ण मानवीय समाज को कर्म-व्यवसाय के आधार पर चार वर्ण में वर्गीकृत कर जातीय संरचना का निर्माण हुआ । ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य व शूद्र । ईन चार वर्णों के भितर विभिन्न जाति एवं उपजाति विकसित हुआ ।

इन्हीं वर्ण एवं जातीय संरचना में वैश्य वर्ण अन्तर्गत भुर्जी जाति बना । को नेपाल में भुर्जी य   मदशिया कानु हलवाई  बोलते है! भुर्जी जाति का पृष्ठभूमि, चरित्र, जीवन और आजीविका 'अन्न एवं अन्य फसल उगाना, उन पदार्थाें का पाककला के माध्यम से स्वादिष्ट व्यञ्जन और मिष्टान बनाना तथा देवी-देवता, ऋषि-मुनि, पितृ एवं समस्त समाज की क्षुधा को तृप्त करने' जैसे सर्वाधिक प्राचीन सामाजिक आयाम और प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है ।हमारा बहुत पिछला जीवन कबिलाई संस्कृति से जुड़ा हुआ है । कदाचित उन समूहों मे भोजन-प्रभारी (या समूह) भी जाति विशेष के रूप में सम्बोधित होते थे । हमें हमारी आदिम इतिहास, संस्कृति और पहचान पर गर्व है । हम अपनी विशिष्टताओं का स्मरण कर रोमाञ्चित होते हैं ।

और, यदाकदा टूटी-फूटी जातीय इतिहास और अशिक्षा-गरिबी से ग्रस्त अपने कुटुम्बों की बद्हाली देखकर दुःखी भी होते हैं ।
सम्भवतः इतिहासकारों ने जितनी सजगता एवं तत्परता राजवंशो के इतिहास लेखन में दिखाई है, उतनी जातीय इतिहास लेखन में नहीं ।

यही कारण है कि जातीय एवं उपजातीय इतिहास विशुद्ध रूप से सामने नहीं आ पाया है । यह खुशी की बात है कि सदियों से शोषित, पीडित, उपेक्षित आम जातियों में २० वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जातीय जागरण का श्री गणेश हुआ और वर्तमान दौर में यह एक उचाई पर है ।

सांस्कृतिक जिज्ञासा, पहचान और समान जातीय महता की खोज तीव्र रूप में बढ़ गया है । भुर्जी कान्यकुब्जवैश्य जाति भी इससे अछुता नहीं है ।
भारतीय वाङमय के अनुसार मोदनसेन जी महाराज, यज्ञसेन जी महाराज, गणीनाथ जी महाराज तथा महान संत पलटु दास एवं महाकवि जय शंकर प्रसाद जैसे वैश्य- भुर्जी  जाति की महानतम विभुति इस समाज के नहीं बल्कि विश्व के गौरव भुर्जी जाति का प्रादुर्भाव और इतिहास की बातें वेदकाल से लेकर वर्तमान काल खण्डों तक विभिनन समय में सिर्जित यजुर्वेद (अध्याय-३२ सुक्ति-१२), अथर्ववेद गरुड़ पुराण (अध्याय ४४ क-१८), वराहपुराण, मनुस्मृति, गर्ग संहिता (खण्ड-७ अध्याय-८), वर्णविवेक चन्द्रिका,

वर्ण विवेकसार जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थों में उल्लेख है । आधुनिक काल में विभिन्न विद्वानों द्वारा भुर्जी जाति पर शोध कर विभिन्न ग्रन्थ, शोधपुस्तक, इन्टरनेट प्रकाशित किया गया है ।

शताब्दी पूर्व स्थापित अखिल भारत भुर्जी सेना  से लेकर उसके बाद विभिन्न काल में विभिन्न स्थान पर स्थापित संघ-संगठनों ने जाति एकीकरण का प्रयास किया है, जातीय इतिहास और संस्कृति का अध्ययन कर प्रसारित किया है और आधुनिक राज्य व्यवस्था में जातीय हिस्सा प्राप्त करने में क्रियाशील हैं ।

'वर्णविवेक चन्द्रिका' में सृष्टि का उत्पत्ति क्रम दिखाते हुए वैश्यों की उत्पत्ति और बाद मे कान्यकुब्जवैश्य भुर्जी वैश्यों की उत्पत्ति का वर्णन निम्न लिखित अनुसार है

देव देव महादेव लोकानां हितकाकार ।
वर्णानामाश्रमाणां च संकाराणां तथैवच ।।
उत्पत्तिं श्रोतु मिच्छासि विस्तरेण कृपानिधे ।
कृया तृत्या महादेव, फलौ तिष्ठेच मानावः ।।
अर्थात— 'श्री पार्वती जी ने देवों के देव श्री महादेव जी से पूछा कि हे कृपानिधे!

मनुष्यों के वर्ण, आश्रम, उत्पत्ति तथा संकरों के भेद क्या है? कृपया लोकों के हित के लिए विस्तार पूर्वक कहिये ।

' इस पर श्री महादेव जी ने कहा—
श्रृणु देवी प्रवक्ष्यामि जातीनांच विनिर्णयम् ।
अव्यक्ताच समुत्पन्ना ब्रह्मविष्णु महेश्वराः ।।
ब्राह्मण निर्मिता वर्णामुख बाहुरूपादतः ।
ब्राह्मणः क्षत्रियों वैश्यः शूद्रश्रैव यथा क्रमम ।।
अर्थात— 'हे देवी! सुनो! जातियों का विवरण इस तरह है कि, पहले अव्यक्त यज्ञ से ब्रह्मा, विष्णु , महेश्वर उद्धत हुए ।

फिर प्रजापति (ब्रह्मा) ने मुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रीय, उरू से वैश्य और पाद से शूद्र वर्ण रचे ।' फिर मरीचिरत्र्यंगिरसौ पुलस्यः पुलहः क्रतुः ।
भृगुर्वशिष्ठ श्रयवो नारदो दक्ष एच च ।।
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च ब्राह्मणेषु प्रतिष्ठिताः ।
वेदाध्ययन सम्पन्ना स्त्रिषु वर्णाषु पूजिताः ।।

अर्थात— मरीचि, अंगिरा, पुलस्य, पुलह, क्रत, भृगु, वशिष्ठ, श्रयव, नारद और दक्ष के पुत्र प्रभृति से ब्राह्मणों का वंश चला । और ये, वेदादि से सम्पन्न तीनों वर्णो से पूजित और गोत्रकार ऋषि हुए ।

और —
ब्राह्मणो बाहु देशाश्च मनुः स्वायंम्भुवोऽभवत् ।
वाम वाहोः समुत्पन्नां शतरूपा पतिव्रताः ।।
तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च क्षत्रवंशे प्रतिष्ठिताः ।
चतुर्दशमनूनां च वंशास्ते क्षत्र जातयः ।।

अर्थात— प्रजापति के दाहिने बाहु देश से स्वायम्भुवमनु तथा बाहु से उनकी स्त्री शतरूपा नास्त्री उत्पनन हुई । इनके पुत्र पौत्र प्रभृति क्षत्रीय वंश के प्रतिष्ठित हुए ।
इसके बाद —

अरूदेशात्समुतपन्नों ब्राह्मणः प्राणवल्लभे ।
भलनदनेति विख्यातस्तस्य पत्नी मरूत्वति ।।
वत्समीति सुतस्तस्य प्रांशुस्तस्याऽभवनसुतः ।
प्राशोः पुत्राः षडासन्वै तेषां नामानिमे श्रृणु ।।
मोदः प्रमोदो बालश्च मोदनश्च प्रमर्दनः ।
शंकुकर्णेति विख्यातस्तेषां कर्म पृथक् पृथक ।।

अर्थात— प्रजापति के उरू देश से वैश्यों के मूलपुरुष भलनन्दन और उनकी स्त्री मरूत्वती नाम से पैदा हुई । इनके पुत्र वत्सप्रीति, वतसप्रीति से प्रांशु हुए । प्रांशु के छः पुत्र हुए जिनका नाम क्रमशः मोद, प्रमोद, बाल, मोदन, प्रमर्दन, शंकु और कर्ण हुआ । इनके कर्म भी पृथक पृथक हुए ।

मोदनस्य च वंशाये मोदकानां प्रकारकाः ।
वैश्य वृत्ति समाश्रित्य संजाताः पृथिवीतले ।।
अर्थात— मोदन के वंश में, मोदक (लड्डू) आदि का व्यवसाय करने वाले— वैश्य उत्पन्न हुए । जो कि इस वैश्य वृत्ति के द्वारा संसार में फैले । वर्णविवेक चन्द्रिका के अनुसार भलनन्दन और मरूत्वती नाम से उत्पन्न नाम से भुर्जी जाति का विकास हुआ।

जिस तरह माली द्वारा तोडा गया फूल, डोम द्वारा बनाया गया बा'स का वर्तन, कुम्हार द्वारा बनाया गया मिट्टी का वर्तन धर्म कार्य हेतु शुद्ध माना गया हैं, उसी तरह सिर्फ भुर्जी द्वारा बनायी गई नेवैद्य ही देवी देवता को अर्पण करने के लिए शुद्ध माना गया हैं ।

मोदनसेन, मोदक और मोदनवाल
मोदनसेन महाराजा के बाद व्यञ्जन÷मिष्ठानादि के लिए जातीय कर्म में निरूपित हुए ।

उनका मूल नाम 'मोदन' से मोदक शब्द बना जिसका तात्पर्य सर्वोत्कृष्ठ मिष्ठान्न होता है । संस्कृति में 'मोदक' शब्द का अर्थ इस प्रकार दर्शाया गया है— मुद वर्ष ददति मोदक यानि जो सबको आनन्दित करें ।

मोद से ही मधु अर्थात मिठा होता है । उसी तरह मोदन का अर्थ बताया गया है— जिसमें सबको आनन्दित करने की क्षमता निहित हो । इस तरह संस्कृत के भावार्थ में 'मोदन' एक व्यक्तित्व के रूप में और 'मोदक' एक वस्तु के रूप में प्रतीत होता है ।
मोदक को बोलचाल में लड्डु कहते हैं ।

मिष्ठान बनाने वाले भुर्जी भोजवाल प्रथम पुजीत भगवान् श्री गणेश जी का प्रिय भोजन मोदक (लड्डु) बनाने वाले के नाम से जाने जाते हैं । इसिलिए मोदक बनाने वाले मोदनवाल के रूप में परिचित हैं । आटा, चिनी, घी, बदाम, पिस्ता और केशर के मिश्रण से बनने वाला स्वादिष्ट मिष्टान्न भोजन विभिन्न पकवान बनाने वाले को  भुर्जी यभोजवालकहा गया है ।

किन्तु  कुछ अखिल भारतीय वैश्य  महासभा इस बात से सहमत नहीं है । महासभा की शताब्दी प्रवाह स्मारिका के अनुसार एक मात्र 'भोजन' से 'भुर्जी भोजवाल  समझना उचितउचित होगा  । यहाँ इस तरह के मिष्ठान को 'मोहनभोग' कहा है भुर्जी शब्द भूंज कर बेसन लड्डू  लाई रेवडी चूरा बनाना! जिससेभुर्जी भरभूंज भोज  नामको लेकर सभी स्वजातीय एक मत नहीं है  कही भुर्जी    भर भुजा  भोज    भोजवाल है भरभूंज शब्द अपभ्रंश होकर भुर्जी हुआ जिसका तात्पर्य खेती करके के अन्न  अन्न उगाना और विभिन्न  भोज्य  तैयार करना और उसका भोज्य मोदक आदि मिष्ठान सहित विभिन्न व्यञ्जन बनाने के कारण ये भुर्जी तथा भोज  भोजवाल आदि शब्दों से परिचित हुए । 'वाल' शब्द समूह वाचक है । संस्कृत में इसका अर्थ है— वृक्ष । ये चारो ओर से मिट्टी के घेरे से मेढ़ बन्दी कर दी जाती है । उसे वाल कहा गया है ।

अतः भुर्जी ये भोजवाल सगुणों से परिपूर्ण प्रतीत होता है! भुर्जी जाति विशेष को भोजवाल टाइटिल से पुकारा जाताहै । आज भुर्जी जाति विभिन्न टाइटिल प्रयोग करने लगे है.।  बहुत सारे विशेषज्ञों का मत भोजवाल  भुर्जी का इतिहास  महाराजाओं  के साथ शुरू होता है । समय अनुसार  अलग अलग जातियों व सम्प्रदाय में बटन गए! इतिहास📜📜 के अनुसार समस्त  मानव जाति में पहला  बुद्धि मान मानव हुआ जिसने सर्वप्रथम भोजन पकाया  ! और और बिभिन्न भोज्य बनाया!  इस लिए भुर्जी कहलाए! 

 भुर्जी जाति ने गोत्र, इष्टदेव एवं  जाति कश्यप गोत्र के माने जाते हैं ।  अपने इष्टदेव के रूप में मोदनसेन, यज्ञसेन, गणीनाथ  तथा अन्य विभुतियों को पुजते हैं । शिव काल भैरव चन्द देव  विभिन्न देवी-देवता के रूप में गणपति, सूर्य, अग्नि, काली बन्दी का आराधना करते हैं ।

मूलतः भुर्जी के वंशज तीन सांस्कृतिक समूहों में होने का वर्णन अखिल भारत भुर्जी भोजवाल  भरभूंज महासभा के वेबसाइट पर पाया गया है ।

मोदनसेनी भुर्जी मोदनसेन जी महाराज को, यज्ञसेन भुर्जी यज्ञसेन जी महाराज को तथा मधेशी हलुवाई गणीनाथ जी महाराज से अपना वंश वृक्ष जुड़ा होने का विश्वास करते हैं ।

मोदनसेन जी कान्यकुब्ज (कन्नौज, उत्तरप्रदेश) में अवतरित हुए । यज्ञसेन जी बिठूर कानपुर (उत्तर प्रदेश) में अवतरित हुए । गणीनाथ जी गुरलामान्धता पर्वत पलवैया (बिहार) में अवतरित हुए ।

इसी क्षेत्रीय धरातल पर इनके वंशजों का विस्तार हुआ । अर्थात गणीनाथ, मोदनसेन और यज्ञसेन जी महराज तीनों समूह के कुलदेवता के रूप में पूजित होने का वर्णन पाया जाता हैं ।

वैश्य वंशवृक्ष की जड़ में मूल देवता भलनन्दन जी महाराज हैं । उपर अंकित श्लाकों के अनुसार प्रजापति ब्रह्मा के उरू देश से उत्पन्न भलनन्दन के पौत्र के रूप में मोदन उत्पन्न हुए । प्रजापति के द्वारा आयोजित यज्ञ में मोदनसेन जी महाराज को खाद्य-व्यवसायी (भुर्जी) का चरित्र प्रदान किया गया उल्लेख होने से उनका वंशज मोदनसेनी (मोदनसेनी भुर्जी ) कहलाए ।

उसी तरह राजा दक्ष के यज्ञ के क्रम में यज्ञसेन उत्पन्न हुए । यज्ञसेन के वंशजो द्वारा यज्ञ-निर्मित पदार्थों को व्यापार करने के कारण यज्ञसेनी (यज्ञसेनी भुर्जी) कहलाए । संत गणीनाथ एघारवीं सदी में उत्पन्न हुए । वे शिव की अवतार कहलाते हैं ।

गणीनाथ जी का पिता मनसा राम जी हलवाई के १४ कुलदेवों में पूजित हैं । आस्था के आधार पर भुर्जी जाति में कुलदेवता निम्न प्रकार हैं —

१. भुर्जी (मोदनवाल) -मोदनसेन जी महाराज
२. भुर्जी (यज्ञसेनी) - यज्ञसेन जी महाराज
३. मधेशिया भुर्जी -गणीनाथ जी महाराज
४. कान्य कुब्ज वैश्य (भूर्जि) - बाबा पलटू दास
५. भौज्य हलवाई - चन्द्रदेव जी महाराज
६. क्रोंच हलवाई- कंकाली बाबा
७. गुडिया वैश्य- भुर्जी यह घटक उड़ीसा प्रान्त में गुड का व्यवसाय और गुड की स्वादिष्ट मिष्ठान बनाने का कार्य करते हैं ।

मोदनसेन जी महाराज
आदि काल में प्रजापति ब्रह्मा के द्वारा विश्व कल्याण के लिए सभी देवी-देवता, ऋषि सम्मिलित महायज्ञ आयोजन किया गया । यज्ञ में मोदनसेन जी पर भोजन व्यवस्था का दायित्व था ।

भांती भांती के व्यञ्जन और मिष्ठान बनाकर यज्ञजनों को सन्तुष्ट करने के कारण उनको इस कार्य (पाकशास्त्र) के आचार्य घोषित किया गया । बाद में उनके वंशज इसी चक्र द्वारा संसार में फैले । मोदनसेन जी महाराज भलनन्दन जी की चौथी पीढ़ी में तथा उनके पूवर्ज मनु महाराज से सातवीं पीढ़ी में उत्पन्न हुये थे । आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व श्री मोदनसेन जी महाराज की जयन्ती कार्तिक शुक्ल (अक्षय नवमी) को मनाने की परम्परा मिली है ।

यज्ञसेन जी महाराज
प्रजापति दक्ष के यज्ञ के समय महर्षि भृगु ने ऋचाओं के गायन-आवाहन के साथ, ज्योंही यज्ञकुण्ड की दक्षिणाग्नि में घृताहुति दी, त्योंही यज्ञाग्नि से तप्त स्वर्ण की सी कांति लिऐ एक यज्ञ पुरुष प्रकट हुए । यह यज्ञ पुरुष कस्तुरी मृगों से जुते हुए, दिग्विजयी रथ पर आरूढ़, मणिमुकुटों को धारण किये हुए थे ।

उन्हें महर्षि मृगु ने ऋभु यज्ञसेन नाम से सम्बोधित किया । यज्ञसेन का विवाह ऋषिपुत्री दक्षिणा से हुआ और उनके ९२ पुत्ररत्न हुए । जो यज्ञ-निर्मित पदार्थों को बनाते व व्यापार करते थे । पुराण के प्रथम अंक के सातवें अध्याय के श्लोक ९३ से २९ तक यज्ञसेन वंश का वर्णन मिलता है । यज्ञसेन महाराज के वंशजो को यज्ञसेनी भुर्जी कहा जाता है ।

यज्ञसेन जी गुरु पूर्णिमा को अवतरित हुए थे । यज्ञसेन जी का उद्भव कहाँ हुआ था इस विषय में मंगली प्रसाद गुप्त ने लिखा है कि 'बिठूर, जिला कानपुर (उत्तर प्रदेश) में हुए थे ।' कुछ लोगों का मत है कि कानपुर से कुछ किलोमिटर दूर गंगा-तट पर जाजमऊ में हुये थे । तिसरा मत यह है कि यज्ञसेन जी महाराज मथुरा में हुये थे ।

कुछ का मत है कि यज्ञपुर तीर्थ (बिहार-उड़िसा) में हुये थे । इनमें बिठूर (कानपुर) ही ठीक प्रतीत होता है, यहाँ यज्ञ कीलक (कीलों) ब्रह्मशिला है, जहाँ पर यज्ञसेन महाराज ने एक महान यज्ञ किया था ।

गणीनाथ जी महाराज
विक्रम संवत् १००७ में श्री मनसाराम तथा उनकी पत्नी शिवादेवी की तपस्या पर प्रसन्न होकर गणीनाथ जी का उद्भव् जगदम्बा पार्वती जी के आग्रह पर देवाधिदेव महादेव ने लोककल्याणार्थ किया ।

गणीनाथ जी का उद्भव् गुरलामान्धता पर्वत पर भाद्रपद बदी अष्टमी शनिबार के प्रातः हुआ । शिशु गणी जी का लालन-पालन व शिक्षा-दीक्षा का दायित्व कान्दू (मध्यदेशीय) वैश्य परिवार के मनसा राम को धर्मपिता के रूप में निर्वहन करना पड़ा । गणी जी योग्य होने पर प्रारम्भिक शिक्षा गुरुकुल में की जहाँ अल्पकाल में ही वेद वेदांग में दक्षता प्राप्त की ।

शारीरिक एवं बोद्धिक विकास के लिए बल योग साधन भी किए जो कालन्तर में श्री गणीनाथ जी के नाम से प्रसिद्ध हुए तथा बड़े होकर, काशी आदि तीर्थों से होते हुए अंततः महाकाल की पावन स्थली मध्यप्रदेश के उज्जैन नगर पहुँचे जहाँ उनकी भेंट गुरु गोरखनाथ से हुई ।

चतुर्दिक ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु गोरखनाथ को गुरु ग्रहण करते हुए उनके सानिध्य में वर्षों तप किए । सिद्धियों पर अधिकार प्राप्त कर पलवैया (बिहार) की पवित्र धरती पर पहुँचे जहाँ आपने गणराज्य की स्थापना कर समताम राज्य स्थापित किया ।
हिन्दु समाज जब पतन की ओर जा रहा था तो गणीनाथ जी ने हिन्दुओं में स्वाभिमान भरा और हिन्दु संस्कृति की रक्षा की ।

पलवैया में गणीनाथ मन्दिर और उस मन्दिर की ओर से संरक्षित संस्कृत पाठशाला, कुआं, पोखरा आदि हैं । उन्होनें शनित के साथ अहिंसा का भी पाठ पढाया तथा वेदाध्ययन को ब्राह्मणों के चंगुल से मुक्त किया । उन्होनें मुस्लिम आततातियों से युद्ध कर उन्हें पराजित किया ।
कालान्तर में गणीनाथ जी का विवाह झोटी साब की पुत्री क्षेमा सती से हुआ ।

(वंशवृक्ष स्मारिका पृष्ठ ११८)
विक्रम संवत् १११२ (क्वार महिना) नवरात्री के अवसर पर आयोजित श्री रामजन्मोत्सव एवं शक्ति आराधना कार्यक्रम को सम्बोधन करने के उपरान्त गणीनाथ जी ने देहत्याग किया ।
भुर्जी जाति का उत्पति (देव-मानव वृक्ष)
भुर्जी समाज का इतिहास मनु द्वारा स्थापित वर्ण व्यवस्था से बहुत पुराना आदिकालीन है ।

वर्ण व्यवस्था के अनुसार चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य और शूद्र) मे से हलवाई वैश्य वर्ण अन्तर्गत पड़ता है । वैश्य तथा हलवाई समाज का इतिहास गौरवशाली है । सभी पुरानी गाथाओं में राजाओं के बाद वैश्यों का नाम सम्मानपूर्वक लिया गया है ।

इनका उत्पत्ति प्रजापति ब्रह्मा के द्वारा है । प्रजापति ब्रह्मा से मुनि मरीचि उत्पन्न हुए । मरीचि से कश्यप एवं कश्यप से विवस्वत मनु उत्पन्न हुए । विवस्वत मनु से निदिस्थ तथा निदिस्थ से नाभाग (वैश्यतांगताः) उत्पन्न हुए । नाभाग से भलनन्दन तथा भलनन्दन से वत्सप्रीति उत्पन्न हुए । वत्सप्रीति से प्रांशु उत्पन्न हुए । प्रांशु से मोदन उत्पन्न हुए ।

मोदन से मोदनसेन कहलाए । मोदनसेन के वंशज मोदनसेनी या मोदनवाल कहलाए ।
पार्वती के पिता राजा दक्ष द्वारा आयोजित अनुष्ठान में कार्यरत हलवाई को यज्ञ के रक्षा हेतु तत्काल सेना नियुक्त किया गया वह यज्ञसेन जी कहलाए । उसी तरह शिव अवतार के रूप मे संत श्री गणीनाथ जी महाराज को उत्पन्न हुए । मध्यदेशीयं हलवाई सन्त गणीनाथ को अपना कुलदेवता मानते हैं ।

संस्कार
हिन्दु धर्म वर्ण व्यवस्था मण्डल द्वारा प्रकाशित जाति अन्वेषण ग्रन्थ के पृष्ठ २८७ पर उल्लेख है कि भुर्जी उपनाम यज्ञसेनी कान्यकुब्ज अथवा मोदनवाल जाति के लोग शुद्ध वैश्य हैं एवं इन्हें वैश्य वर्ण के अनुसार समस्त धार्मिक कार्य सम्पन्न करने का पूर्ण अधिकार है । भागवत गीता के अनुसार अध्ययन, भजन और दान तीन धर्म तथा कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य ये तीन जीविका है । १२ वर्ष में यज्ञोपवित होना चाहिए ।
भुर्जी मुख्यतः हिन्दू होते है । लेकिन मुस्लिम में भी हलवाई जाति होने का उल्लेख मिलता है । हिन्दू एवं बौद्ध धर्म के अनुयायी नेपाल मे नेवार समुदाय में भी भुर्जी होने का प्रमाण मिलता है । खासकर हिन्दू भुर्जी  हिन्दू धर्मावलम्बी के सभी संस्कारों को अंगीकार करते हैं । वैदिक कर्मकाण्ड के अनुसार हिन्दुओं को १६ संस्कार पूरा करने का प्रावधान है ।

१. गर्भाधान संस्कार २. पुंसवन संस्कार ३. सीमन्तोन्नयन संस्कार ४. जातकर्म संस्कार ५. नामकरण संस्कार ६. निष्क्रमण संस्कार ७. अन्नप्राशन्न संस्कार ८. चूड़ाकर्म (मुण्डन) संस्कार ९. विद्यारम्भ संस्कार १०. कर्णवेध संस्कार ११. यज्ञोपवित (उपनयन) संस्कार १२. वेदारम्भ संस्कार १३. केशान्त संस्कार १४. समावर्तन संस्कार १५. पाणिग्रहण संस्कार एवं १६. अन्त्येष्टि संस्कार ।

एभयउभि न्चयगउक क्ष्लमष्ब के अनुसार भुर्जी  उपनयन संस्कार के हकदार हैं । ब्राह्मण-क्षेत्री के तरह हलुवाई भी उपनयन संस्कार के हकदार हैं ।
मान्यजन प्रथा
मान्यजन प्रथा भुर्जी  जाति का एक सांगठनिक प्रथा है ।

यह एक प्राचीन जातीय संगठन है जो सभी वैश्य तथा अन्य जातजातियों में भी है । जातीय बाहुल्य इलाका या गावं मान्यजन प्रथा के मातहत संगठित होता था । संगठन के मुखिया को मान्यजन कहा जाता था । जातीय विवाद को सुल्झाने प्रमुख जिम्मेवारी मान्यजन का होता था । उन्हें पुरस्कृत करने या दण्ड देने का अधिकार होता था ।

कुछ प्रमुख व्यक्ति या सामूहिक÷जातीय छलफल के आधार पर मान्यजन अपना निर्णय देते थे । विवाह, श्राद्ध जैसे संस्कार में मान्यजन का परामर्श लिया जाता था । भोज कार्य में सामूहिक न्यौता मान्यजन के मार्फत दिया जाता था । मान्यजन अपनी कार्य सम्पादन करने हेतु सहयोगी नियुक्त करते थे । आज कल मान्यजन प्रथा संकुचित होते गया है ।

भुर्जी जाति का विस्तार
आदि पुरुष श्री मोदनसेन महाराजा के वंशावली सम्बद्ध ग्रन्थों के अनुसार वैश्यों की ३५२ उपजातियां तथा १४४४ ग्रन्थों की संख्या बताई गई है । हलवाई जाति आज संसार भर में फेले हैं । परन्तु इस जाति का उद्गमस्थल कहाँ है? कुलपुरुष मोदन जी ने अपना वंश पृथ्वी के किस खण्ड से विस्तार किया? महाराज भलनन्दन जी कान्यकुब्ज देशाधिपति थे ।

जिनकी राजधानी महोदयपुरी थी जो अब कन्नौज के रूप में जानी जाती है और यह उत्तर प्रदेश के अन्तर्गत पड़ता है । अस्तु मोदनसेन का विस्तार कान्यकुब्ज देश से हुआ । कालान्तर में मोदन वंशीय वैश्यों का कई वर्ग और उपवर्ग बना ।

यज्ञसेन जी का वंशज कान्यकुब्ज से निचे कानपुर क्षेत्र से हुआ और गणीनाथ जी का वंशज उससे निचे पटना आसपास से चारो ओर फैले । वैश्विक आप्रवासन का प्रभाव इन पर भी पड़ा ।

और हजारौं वर्ष के दौरान ये संसार भर फैले । भुर्जी  जाति का कान्यकुब्ज देश से लेकर मध्यदेशीय जनपदों तक का प्राचीन बसोवास आज भारत, नेपाल, पाकिस्तान, बंगलादेश में बटा हुआ है । नेपाल के मधेशी हलवाई साह, साहु, साउ, गुप्ता, दास  सरनेम से जाने जाते हैं ।  भुर्जी जाति भारत के विहार, वंगाल, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र  मगध, कन्नौज आदि क्षेत्र से ताल्लुक रखता है ।

उत्तर प्रदेश में भुर्जी भोजवाल  सकसेना  मोदनवाल, यज्ञसेनी, हलवाई, गुप्ता, पंजाव मे कम्बोज, अडोडा, उडिसा में गुडिया, पश्चिम बंगाल मे मायरा, दास टाइटल से जाने जाते हैं । इनका अभी तक ९-१० उप समूह देखा गया है । जैसे मधेशीया, मोदनसेनी, कान्यकुब्ज, यज्ञसेनी, मघिया, जैनपुरी, कानवो, कैथिया, नगारी, रावतपुरिया, बदशाही । इनकी भाषा क्षेत्र के आधार पर हिन्दी, मैथिली, बंगाली, अवधी, भोजपुरी रहा है ।

नेपाल मे हिमाली जिला को छोडकर महाभारत पहाड़ एवं तराई भूभाग के प्रायः सभी जगह इनकी कहीं सघन तो कहीं अल्प उपस्थिति पाया जाता है । फिर भी पूर्वी तराई के जिलों में तुलनात्मक रूप में अधिक जनसंख्या पाया जाता है । नेपाल में भुर्जी  जाति सामाजिक-पिछड़ेपन एवं विभेद का सिकार हैं ।

सामाजिक चेतना की कमी के कारण यह अपनी मानवीय मूल्य, धार्मिक मान्यता, सांस्कृतिक गौरव, राजकीय अवसर, व्यावसायिक संरक्षण सर्वपक्षीय हक और अधिकार से वञ्चित हैं ।
जनसंख्या
वैश्य अन्तर्गत सैकडों जातियां समाहित हैंं । नेपाल में इनकी चार दर्जन से अधिक जातियां हैं ।

वहीं भारत में वैश्य जातियों की संख्या तीन सौ ५२ बताया जाता है । भारत वर्ष में वैश्यों का संख्या २५ करोड से ज्यादा बताया जाता है । वैश्य समाज का गौरवशाली इतिहास है और समाज में इनका नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है ।
विश्व के जातिजातियों का अनुसन्धान में संलग्न व्यकजगब एचयवभअत के मुताविक नेपाल में हिन्दू के साथ मुस्लिम भुर्जी भी निवास करती है ।

इस देश में हिन्दू भुर्जी की कुल जनसंख्या ५७ हजार है । उसी तरह इस देश में मुस्लिम भुर्जी की जनसंख्या आठ सौ है । इनके अतिरिक्त नेपाल में नेवार हलवाई का भी कुछ जनसंख्या देखा जाता है । काठमाण्डू उपत्यका का मूल निवासी 'नेवार' जो हिन्दू या बुद्ध धर्म के अनुयायी होते हैं इनकी जनसंख्या तो स्पष्ट नहीं हो पाया है ।

मगर ये लोग नेवार भुर्जी जाति कहलाने के साथ साथ सरनेम में भी  भुर्जी ये हलवाई ही लिखते हैं । ईन लोगों का जातीय पेसा भी मिष्टान्न बनाना ही होता है ।
भारत में हिन्दू एवं मुस्लिम भुर्जी का बसोबास है । यहाँ हिन्दू  भुर्जी  का कुल जनसंख्या २० लाख २३ हजार बताया गया है ।

पश्चिम बंगाल में चार लाख चार हजार, बिहार में चार लाख ३३ हजार, उत्तर प्रदेश में दो लाख ७४ हजार, झारखण्ड में ९६ हजार, उड़िसा में पाँच हजार ६ सौ, मध्यप्रदेश में चार हजार नौ सय, छत्तीसगढ में तीन हजार पाँच सौ, महाराष्ट्र में दो हजार तीन सौ अन्डमान निकोबर में एक हजार पाँच सौ है । भारत में मुस्लिम हलुवाई का जनसंख्या एक लाख ५१ हजार है । जिनमें उत्तर प्रदेश में एक लाख ४८ हजार है तो उत्तराञ्चल में तीन हजार आठ सौ का बसोवास है ।

पाकिस्तान में मुस्लिम हलुवाई बसोवास करते हैं । यहाँ इनकी संख्या १९ हजार है । जिनमें सिन्ध प्रान्त में १२ हजार, पञ्जाब में सात हजार तीन सौ और बलुचिस्तान में १० बसोबास करते हैं ।
बंगलादेश में ८२ हजार हिन्दू हलवाई बसोबास करते हैं । इनमें राजशाही में ४६ हजार, ढाका में १८ हजार, खुल्ना में ११ हजार, चटगावं में तीन हजार तीन सौ, सिल्हट में एक हजार आठ सौ और बारिसल में पाँच सौ का बसोवास है ।

पर्वत्यौहार
नववर्ष- द्वादसमासैः संवत्सर । ऐसा वेदवचन है, इसीलिए यह जगत्मानय हुआ । सर्ववर्षारम्भों में अधिक योग्य प्रारम्भ दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा है । इसे पुरे नेपाल व भारत में अलग अलग नाम से सभी हिन्दू हलवाई धूमधाम से मनाते हैं । हिन्दू धर्म में सूर्योपासना के लिए प्रसिद्ध पर्व है छठ ।

मूलतः सूर्य षष्ठीव्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है । यह पर्व वर्ष में दो बार (कात्तिक और चैत) मनाया जाता है । आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवरात्रोत्सव आरम्भ होता है । नवरात्रोत्सव में घटस्थापना करते हैं । अखण्ड दीप के माध्यम से नौ दिन दुर्गादेवी की पूजा अर्थात नवरात्रोत्सव मनाया जाता है । श्रावण कृष्ण अष्टमी पर जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता है ।

सामाजिक अवस्था
यह हिन्दू जाति के स्वाभिमानी, वैष्णव समुदाय के सामाजिक एवम् धार्मिक कर्मकाण्ड के महत्व के आधार पर अपना उच्च अस्तित्व समाजमे परा पूर्व काल से ही कायम रखा है । अन्य वर्ण जातिके साथ साथ ब्राह्मण वर्ण (हिन्दू पुरोहित) भी इनके द्वारा बनाए गए पकवान ग्रहण करते है । यानी की हिन्दू धर्म के प्रत्येक अनुष्ठान, जन्म, विवाह, ब्रतबन्ध आदि उत्सव त्योहार मे इनकी भूमिका रहती हैं ।

श्रोतः शताब्दी प्रवाह अखिल भारतीय वैश्य भुर्जी  महासभा
लेकिन आज जातीय उत्कर्ष की होड में भुर्जी  समाज अपनी हीन भावना से ग्रसित है । स्वजातीय बोधक भुर्जी ' शब्द प्रयोग करने में हीनता का आभाष किया जाता है । जबकि समाज के सभी वर्गों के पूजापाठ एवं शुभ कर्म प्रयोजन में   भुर्जी  भोजवाल द्वारा बनाया गया पकवान एवं मिष्ठान शुद्ध माना जाता है भुर्जी जाति का सामाजिक अवस्था कठिन परिस्थितियों में भुर्जी अपने को  सामाजिक व्यवस्था के अनुकुल बना लेते हैं। और सामाजिक पिछड़े पन के कारन भुर्जी जाति में हीन भावना बनी रहती है फिर भी कठिन परिश्रम कर परिवार का पालन करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करत हैं भुर्जी जाति के लोग  संयुक्त परिवार में रहते हैं । यह जाति वैष्णव जाति के वर्ग में पड़ता है और स्वभिमानी माना जाता है ।
हमारी समाजिक, आर्थिक राजनीतिक एवं शैक्षिक स्तर के उत्थान के लिए भुर्जी भोजवाल समाज को खुद जागरुक होना पडेगा ।

इसके लिए भुर्जी भोजवाल जाति को अपने अपने गावं, नगर, जिला, प्रान्त तथा राष्ट्रिय स्तर पर संगठित होना जरुरी है । संगठन चाहे संघीय सिद्धान्त के तहत यो या कोई और प्रणाली, पर हमारे संगठन को गा'व गा'व मे विस्तार कर जिला एवम् केन्द्र स्तर पर इस संगठन को एक संगठनात्मक रुपमे मजबुत बनाते हुए भुर्जी भोजवाल के अस्तित्व को समाज मे कायम रखना आज की आवश्यकता है ।

इस अभियान में जातीय संगठनों को अगुवाई करनी होगी और क्षमता मे विकास लाना होगा ।

सत्यनारायण गुप्ता 
चित्रकूट उत्तर प्रदेश

माँ पर कविता

   मां पर कविता मैं अपने छोटे मुख कैसे करूँ तेरा गुणगान माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान माता कौशल्या के घर में जन्म राम ने पाया ठ...