शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

माँ पर कविता

   मां पर कविता

मैं अपने छोटे मुख कैसे करूँ तेरा गुणगान
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान
माता कौशल्या के घर में जन्म राम ने पाया
ठुमक-ठुमक आँगन में चलकर सबका हृदय जुड़ाया
पुत्र प्रेम में थे निमग्न कौशल्या माँ के प्राण
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान
दे मातृत्व देवकी को यसुदा की गोद सुहाई
ले लकुटी वन-वन भटके गोचारण कियो कन्हाई
सारे ब्रजमंडल में गूँजी थी वंशी की तान
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान
तेरी समता में तू ही है मिले न उपमा कोई
तू न कभी निज सुत से रूठी मृदुता अमित समोई
लाड़-प्यार से सदा सिखाया तूने सच्चा ज्ञान
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान
कभी न विचलित हुई रही सेवा में भूखी प्यासी
समझ पुत्र को रुग्ण मनौती मानी रही उपासी
प्रेमामृत नित पिला पिलाकर किया सतत कल्याण
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान
‘विकल’ न होने दिया पुत्र को कभी न हिम्मत हारी
सदय अदालत है सुत हित में सुख-दुख में महतारी
काँटों पर चलकर भी तूने दिया अभय का दान
माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान्

धुप में छाया जैसे,
प्यास में दरिया जैसे
तन में जीवन जैसे,
मन में दर्पण जैसे,
हाथ दुआओं वाले रोशन करे उजाले,
फूल पे जैसे शबनम, सांस में जैसे सरगम,
प्रेम की मूरत दया की सूरत ,
ऐसे और कहाँ है ,जैसी मेरी माँ है।
जब भी अँधेरा छा जाये
वोह दीपक बन जाए ,
जब इक अकेली रात सताए,
वोह सपना बन जाए,
अन्दर नीर बहाए ,
बाहर से मुस्काए,
काया वोह पावन सी,मथुरा-वृन्दावन जैसी,
जिसके दर्शन में हो भगवन ,
ऐसी और कहाँ है,जैसी मेरी माँ है

है माँ…..
हमारे हर मर्ज की दवा होती है माँ….
कभी डाँटती है हमें, तो कभी गले लगा लेती है माँ…..
हमारी आँखोँ के आंसू, अपनी आँखोँ मेँ समा लेती है माँ…..
अपने होठोँ की हँसी, हम पर लुटा देती है माँ……
हमारी खुशियोँ मेँ शामिल होकर, अपने गम भुला देती है माँ….
जब भी कभी ठोकर लगे, तो हमें तुरंत याद आती है माँ…..
दुनिया की तपिश में, हमें आँचल की शीतल छाया देती है माँ…..
खुद चाहे कितनी थकी हो, हमें देखकर अपनी थकान भूल जाती है माँ….
प्यार भरे हाथोँ से, हमेशा हमारी थकान मिटाती है माँ…..
बात जब भी हो लजीज खाने की, तो हमें याद आती है माँ……
रिश्तों को खूबसूरती से निभाना सिखाती है माँ…….
लब्जोँ मेँ जिसे बयाँ नहीँ किया जा सके ऐसी होती है माँ…….
भगवान भी जिसकी ममता के आगे झुक जाते हैँ

मेरे सर्वस्व की पहचान
अपने आँचल की दे छाँव
ममता की वो लोरी गाती
मेरे सपनों को सहलाती
गाती रहती, मुस्कराती जो
वो है मेरी माँ।
प्यार समेटे सीने में जो
सागर सारा अश्कों में जो
हर आहट पर मुड़ आती जो
वो है मेरी माँ।
दुख मेरे को समेट जाती
सुख की खुशबू बिखेर जाती
ममता की रस बरसाती जो
वो है मेरी माँ।

 Maa Kavita in Hindi

 बोलती नहीं,
याद रखती है हर टूटा सपना।
नहीं चाहती कि
उसकी बेटी को भी पड़े
उसी की तरह
आग में तपना।
माँ जानती है
जिन्दगी कि बगिया में
फूल कम – शूल अधिक हैं,
उसे यह भी ज्ञात है कि
समय सदा साथ नहीं देता।
वह अपनी राजदुलारी को
रखना चाहती है महफूज़
नहीं चाहती कि
उस जान से ज्यादा
अज़ीज़ बेटी पर
कभी भी उठे उँगली।
इसलिए वह
भीतर से
नर्म होते हुए भी
ऊपर से
दिखती है कठोर।
जैसे रात की सियाही
छिपाए रहती 

   बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ ,
याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे ,
आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ
चिड़ियों के चहकार में गूँजे राधा-मोहन अली-अली ,
मुर्गे की आवाज़ से खुलती, घर की कुंड़ी जैसी माँ
बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सब में ,
दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी माँ
बाँट के अपना चेहरा, माथा, आँखें जाने कहाँ गई ,
फटे पुराने इक अलबम में चंचल लड़की
अपने आंचल की छाओं में,
छिपा लेती है हर दुःख से वोह
एक दुआ दे दे तो
काम सारे पूरे हों…
अदृश्य है भगवान,
ऐसा कहते है जो…
कहीं ना कहीं एक सत्य से,
अपरिचित होते है वोह…
खुद रोकर भी हमें
हसाती है वोह…
हर सलीका हमें
सिखलाती है वोह…
परेशानी हो चाहे जितनी भी,
हमारे लिए मुस्कुराती है वोह…
हमारी खुशियों की खातिर
दुखो को भी गले लगाती है वो…
हम निभाएं ना निभाएं
अपना हर फ़र्ज़ निभाती है वोह…
हमने देखा जो सपना
सच उसे बनती है वो…
दुःख के बादल जो छाये हमपर
तो धुप सी खिल जाती है वोह…
ज़िन्दगी की हर रेस में
हमारा होसला बढाती है वोह…
हमारी आँखों से पढ़ लेती है
तकलीफ और उसे मिटाती है वोह…
पर अपनी तकलीफ कभी नही जताती है वोह…

I
अम्बर की ऊंचाई, धरती की ये गहराई
तेरे मुंह में है समाई, माई ओ माई,
तेरा मन अमृत का प्याला, येही काबा येही शेवाला
तेरी ममता पावन दाई, माई ओ माई,
जी चाहे तेरे साथ रहूँ मैं बनके तेरा हमजोली
तेरे पास ना आऊं छुप जाऊं, यूँ खेलूं आँख मिचोली,
परियों की कहानी सुना के, कोई मीठी लोरी गा के
कर दे सपने सुखदाई, माई ओ माई,
संसार के ताने बाने से घबराता है मन मेरा
इन झूठे रिश्ते नातों में, बस प्यार है सच्चा तेरा,
सब दुःख सुख में ढल जाएँ तेरी बाहें जो मिल जाएँ
मिल जाये मुझे खुदाई, माई ओ माई,
फिर कोई शरारत हो मुझसे नाराज करूँ फिर तुझको
फिर गल पे थापी मार के सीने से लगा ले मुझ को,
बचपन की प्यास बुझा दे अपने हाथ से खिला दे
पल्लू में बंधी मिठाई, माई ओ माई

माँ भगवान का दूसरा रूप
उनके लिए दे देंगे जान
हमको मिलता जीवन उनसे
कदमो में है स्वर्ग बसा
संस्कार वह हमे बतलाती
अच्छा बुरा हमे बतलाती
हमारी गलतियों को सुधारती
प्यार वह हमपर बरसती.
तबियत अगर हो जाए खराब
रात-रात भर जागते रहना
माँ बिन जीवन है अधुरा
खाली-खाली सुना-सुना
खाना पहले हमे खिलाती
बादमे वह खुद खाती
हमारी ख़ुशी में खुश हो जाती
दुःख में हमारी आँसू बहाती
कितने खुश नसीब है हम
पास हमारे है माँ
होते बदनसीब वो कितने
जिनके पास ना माँहो

MAA KI MAMTA

माँ की ममता करुणा न्यारी,
जैसे दया की चादर
शक्ति देती नित हम सबको,
बन अमृत की गागर
साया बन कर साथ निभाती,
चोट न लगने देती
पीड़ा अपने उपर ले लेती,
सदा सदा सुख देती
माँ का आँचल सब खुशियों की,
रंगा रंग फुलवारी
इसके चरणों में जन्नत है,
आनन्द की किलकारी
अदभुत माँ का रूप सलोना,
बिलकुल रब के जैसा
प्रेम के सागर सा लहराता,
इसका अपनापन ऐसा….

प्यारी माँ पर आधारित कविता

MAA PAR KAVITA

माँ
तुम्हारी लोरी नहीं सुनी मैंने,
कभी गाई होगी
याद नहीं
फिर भी जाने कैसे
मेरे कंठ से
तुम झरती हो।
तुम्हारी बंद आँखों के सपने
क्या रहे होंगे
नहीं पता
किंतु मैं
खुली आँखों
उन्हें देखता हूँ ।
मेरा मस्तक
सूँघा अवश्य होगा तुमने
मेरी माँ !
ध्यान नहीं पड़ता
परंतु
मेरे रोम-रोम से
तुम्हारी कस्तूरी फूटती है ।
तुम्हारा ममत्व
भरा होगा लबालब
मोह से,
मेरी जीवनासक्ति
यही बताती है ।
और
माँ !
तुमने कई बार
छुपा-छुपी में
ढूंढ निकाला होगा मुझे
पर मुझे
सदा की
तुम्हारी छुपा-छुपी
बहुत रुलाती है;
बहुत-बहुत रुलाती है;

MAA KE UPAR KAVITA IN HINDI
हम जुगनू थे हम तितली थे
हम रंग बिरंगे पंछी थे
कुछ महो-साल की जन्नत में
माँ हम दोनों भी सांझी थे
में छोटा सा इक बच्चा था
तेरी ऊँगली थाम के चलता था
तू दूर नजर से होती थी
में आंसू आंसू रोता था
इक ख्वाबों का रोशन बस्ता
तू रोज मुझे पहनाती थी
जब डरता था में रातों में
तू अपने साथ सुलाती थी
माँ तुने कितने बरसों तक
इस फूल को सींचा हाथों से
जीवन के गहरे भेदों को
में समझा तेरी बातों से
मैं तेरे हाथ के तकिए पर
अब भी रात को सोता हूँ
माँ में छोटा सा इक बच्चा
तेरी याद में अब भी रोता हूँ

KAVITA ON MAA IN HINDI FONT
आज मेरा फिर से मुस्कुराने का मन किया।
माँ की ऊँगली पकड़कर घूमने जाने का मन किया॥
उंगलियाँ पकड़कर माँ ने मेरी मुझे चलना सिखाया है।
खुद गीले में सोकर माँ ने मुझे सूखे बिस्तर पे सुलाया है॥
माँ की गोद में सोने को फिर से जी चाहता है।
हाथो से माँ के खाना खाने का जी चाहता है॥
लगाकर सीने से माँ ने मेरी मुझको दूध पिलाया है।
रोने और चिल्लाने पर बड़े प्यार से चुप कराया है॥
मेरी तकलीफ में मुझ से ज्यादा मेरी माँ ही रोयी है।
खिला-पिला के मुझको माँ मेरी, कभी भूखे पेट भी सोयी है॥
कभी खिलौनों से खिलाया है, कभी आँचल में छुपाया है।
गलतियाँ करने पर भी माँ ने मुझे हमेशा प्यार से समझाया है॥
माँ के चरणो में मुझको जन्नत नजर आती है।
लेकिन माँ मेरी मुझको हमेशा अपने सीने से लगाती है॥

+माँ केलिए   कविता +

चुपके चुपके मन ही मन में
खुद को रोते देख रहा हूँ
बेबस होके अपनी माँ को
बूढ़ा होते देख रहा हूँ
रचा है बचपन की आँखों में
खिला खिला सा माँ का रूप
जैसे जाड़े के मौसम में
नरम गरम मखमल सी धूप
धीरे धीरे सपनों के इस
रूप को खोते देख रहा हूँ
बेबस होके अपनी माँ को
बूढ़ा होता देख रहा हूँ………
छूट छूट गया है धीरे धीरे
माँ के हाथ का खाना भी
छीन लिया है वक्त ने उसकी
बातों भरा खजाना भी
घर की मालकिन को
घर के कोने में सोते देख रहा हूँ
चुपके चुपके मन ही मन में
खुद को रोते देख रहा हूँ………
बेबस होके अपनी माँ को
बूढ़ा होता देख रहा हूँ…..

सहृदय से सभी मताओ को समर्पित

 सत्य नारायण गुप्ता भोजवाल

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

जीवन एक प्रतिध्वनि है

एक बार की बात है एक शहर में एक बहुत धनवान सेठ की दुकान थी जो शहर में सबसे अधिक चलती थी। उसकी दुकान पर हर तरह का सामान मिलता था इसलिए दुकान पर हर समय ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी।
उस दुकान पर एक छोटा सा व्यापारी सेठ को मक्खन सप्लाई करता था जो कि एक गोल पेढ़े के आकार का आता था और प्रत्येक पेढ़े का वजन एक किलोग्राम था। वह जितने पेढ़े सेठ को देता था उसके मूल्य के बदले घर की जरूरत में आने वाले सामान जैसे चीनी, चावल, दालें इत्यादि ले जाता था। यह सिलसिला वर्षों से चलता आ रहा था और दोनो एक दूसरे पर पूर्ण विश्वास रखते थे।
एक दिन वह व्यापारी उस सेठ को मक्खन के 50 पेढ़े अर्थात 50 कि.ग्रा. मक्खन देकर गया। सेठ उस पेढ़ो को एक बड़े फ्रिज में रखता जा रहा था। पेढ़े रखते-रखते सेठ के मन मे विचार आया कि क्यों न एक पेढ़े का वजन जांच कर लिया जाये। सेठ ने एक पेढ़ा तराजू पर रखा था उसका वजन 900 ग्राम निकला। सेठ ने दूसरे पेढ़े को तराजू पर रखा उसका वजन भी 900 ग्राम निकला। सेठ को क्रोध आ गया और उसने सभी पेढ़ो का वजन करवाया। उसके आश्चर्य की सीमा ही न रही जब सब पेढ़े 900 ग्राम के ही निकले।
अब सेठ आपे से बाहर हो गया। उसने तुरन्त उस व्यापारी को बुलावा भेजा। व्यापारी आया तो सेठ ने उसे पेढ़ो का वजन करके दिखाया और खूब भरा-बुला कला। उस व्यापारी को कहा गया कि वह ईमानदार नहीं है और उसमें बेईमानी कूट-कूट कर भरी हुई है। उसे यह पाठ भी पढाया गया कि व्यापारी को ईमानदार होना चाहिए।
छोटे व्यापारी ने हाथ जोड़कर बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया कि ‘सेठ जी, मैं एक बहुत छोटा व्यापारी हूँ और मेरे पास बाट खरीदने के लिए भी पैसे नहीं थे इसलिए जब आपकी दुकान से मैं घर के लिए जरूरत का सामान खरीदता था तो सामान का एक पैकेट जो कि 1 किलोग्राम का होता था, उसे तराजू के एक तरफ बाट के स्थान पर रखकर दूसरे स्थान पर उतने ही भार के अनुसार मक्खन को रखकर तौल कर एक पेढ़ा बनाता था जो आपको सप्लाई करता था।’
सेठ को अपनी करनी समझ में आ गई। उसे अपने आप पर शर्म आने लगी थी। सेठ को सही गलत का फर्क महसूस हो गया था। वह मन ही मन सोच रहा था कि बेईमान तो वह है न कि वह छोटा गरीब व्यापारी। उसे ही अपने व्यापार में ईमानदारी रखनी चाहिए थी।
ज्ञानी लोग सही कहते हैं कि जीवन एक प्रतिध्वनि है जो हम अच्छा या बुरा इस संसार को देते हैं कुछ समय बाद वही हमें प्रतिध्वनि के रूप में हमारे पास वापिस आ जाता है। सत्य ही है कि हम दूसरों के लिए जो अच्छा ) या बुरा सोचते या करते हैं, हू-ब-हू वही हमें किसी न किसी तरह वापिस मिल ही जाता है।

सोमवार, 13 जुलाई 2020

गणेश विवाह

गणेश के विवाह का रहस्य

भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र गणेश जी की पूजा सभी भगवानों से पहले की जाती है| प्रत्येक शुभ कार्य करने से पहले इन्हे ही पूजा जाता है| गणेश जी को गणपति के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह गणों के देवता है और इनका वाहन एक मूषक होता है| ज्योतिषी विद्या में गणेश जी को केतु के देवता कहा गया है|

गणेश जी के शरीर की रचना माता पार्वती द्वारा की गई थी| उस समय उनका मुख सामान्य था, बिल्कुल वैसा जैसा किसी मनुष्य का होता है|

एक समय की बात है माता पार्वती ने गणेश को आदेश दिया कि उन्हें घर की पहरेदारी करनी होगी क्योंकि माता पार्वती स्नानघर जा रही थी| गणेश जी को आदेश मिला की जब तक पार्वती माता स्नान कर रही है घर के अंदर कोई न आए|

तभी दरवाज़े पर भगवान शंकर आए और गणेश ने उन्हें अपने ही घर में प्रवेश करने से मना कर दिया, जिसके कारण शिव जी ने गणेश का सर धड़ से अलग कर दिया| गणेश को ऐसे देख माता पार्वती दुखी हो गई| तब शिव ने पार्वती के दुख को दूर करने के लिए गणेश को जीवित कर उनके धड़ पर हाथी का सिर लगा दिया और उन्हें प्रथम पूज्य का वरदान दिया|

किस कारण से नहीं हुआ गणेश जी का विवाह

गणेश जी के दो दन्त भी थे जो उनके हाथी वाले सिर की सुंदरता बढ़ाते थे| किन्तु परशुराम के साथ युद्ध करने के कारण गणेशजी का एक दांत टूट गया था| तब से वे एकदंत कहलाए जाते है|

दो कारणों की वजह से गणेश जी का विवाह नहीं हो पा रहा था| उनसे कोई भी सुशील कन्या विवाह के लिए तैयार नहीं होती थी| पहला कारण उनका सिर हाथी वाला था और दूसरा कारण उनका एक दन्त| इसी कारणवश गणेशजी नाराज रहते थे|

गणेश जी का विवाह किस से और कैसे हुआ

जब भी गणेश किसी अन्य देवता के विवाह में जाते थे तो उनके मन को बहुत ठेस पहुँचती थी| उन्हें ऐसा लगा कि अगर उनका विवाह नहीं हो पा रहा तो वे किसी और का विवाह कैसे होने दें सकते है| तो उन्होंने अन्य देवताओं के विवाह में बाधाएं डालना शुरू कर दिया|

इस काम में गणेश जी की सहायता उनका वाहन मूषक करता था| वह मूषक गणेश जी के आदेश का पालन कर विवाह के मंडप को नष्ट कर देता था जिससे विवाह के कार्य में रूकावट आती थी| गणेश और चूहे की मिली भगत से सारे देवता परेशान हो गए और शिवजी को जाकर अपनी गाथा सुनाने लगे| परन्तु इस समस्या का हल शिवजी के पास भी नहीं था| तो शिव-पार्वती ने उन्हें बोला कि इस समस्या का निवारण ब्रह्मा जी कर सकते है|

यह सुनकर सब देवतागण ब्रह्मा जी के पास गए, तब ब्रह्माजी योग में लीन थे| कुछ देर बाद देवताओं के समाधान के लिए योग से दो कन्याएं ऋद्धि और सिद्धि प्रकट हुई| दोनों ब्रह्माजी की मानस पुत्री थीं|दोनों पुत्रियों को लेकर ब्रह्माजी गणेशजी के पास पहुंचे और बोले की आपको इन्हे शिक्षा देनी है|

गणेशजी शिक्षा देने के लिए तैयार हो गए| जब भी चूहे द्वारा गणेश जी के पास किसी के विवाह की सूचना अति थी तो ऋद्धि और सिद्धि उनका ध्यान भटकाने के लिए कोई न कोई प्रसंग छेड़ देतीं थी| ऐसा करने से हर विवाह बिना किसी बाधा के पूर्ण हो जाता था|

परन्तु एक दिन गणेश जी को सारी बात समझ में आई जब चूहे ने उन्हें देवताओं के विवाह बिना किसी रूकावट के सम्पूर्ण होने के बारे में बताया| इससे पहले कि गणेश जी क्रोधित होते, ब्रह्मा जी उनके सामने ऋद्धि सिद्धि को लेकर प्रकट हुए और बोलने लगे कि मुझे इनके लिए कोई योग्य वर नहीं मिल रहा है| कृपया आप इनसे विवाह कर लें|

इस प्रकार गणेश जी का विवाह बड़ी धूमधाम से ऋद्धि और सिद्धि के साथ हुआ और इसके बाद इन्हे दो पुत्रों की प्राप्ति हुई जिनका नाम था शुभ और लाभ|

कैसे पडा हनुमान जी का नाम

हनुमान जी का नाम कैसे पड़ा

राम भक्त हनुमान के बारे में कौन नहीं जानता। उनकी महिमा अपरमपार है। लेकिन क्या आपको पता है की भगवान बजरंगबली का नाम हनुमान क्यों रखा गया। दरअसल इसके पीछे एक बेहद अनोखा कारण है।

इस कारण रखा गया बजरंग बली का नाम हनुमान

यह तब की बात है जब हनुमान जी छोटे थे। रामायण के अनुसार हनुमान जी का एक नाम बजरंग बली भी है। यह नाम उनके पिता केसरी ने रखा था। जब हनुमान जी छोटे थे तो वह बेहद नटखट थे। एक बार उन्होंने खेल - खेल में सूर्य भगवान को अपने मुंह में ले लिया था। जिसकी वजह से चारों और अंधेरा छा गया था। जब इस बात की खबर स्वर्ग देवराज इंद्र को पता लगी तो वह बेहद गुस्सा हुए। और गुस्से में आकर उन्होंने अपने वज्र से हनुमान जी की ठोढ़ी पर प्रहार किया जिसके चलते वह टुट गई। ठोढ़ी को वैसे संस्कृत में हनु भी कहा जाता है। इस घटना के बाद से ही राम भक्त बजरंगबली का नाम हनुमान रखा गया था।

क्यों हुए श्री राम भक्त हनुमान सिंदूरी

हर कोई यह जानता है कि हनुमान जी श्री राम जी के बहुत बड़े भक्त है। क्या आपको पता है कि श्री राम जी की वजह से ही हनुमान जी सिंदूरी रंग के हो गए थे। दरअसल, जब भगवान श्री राम रावण को मारकर अयोध्या आ रहे थे। तब हनुमान जी ने भी भगवान श्री राम जी के साथ आने की इच्छा जताई। राम जी के बहुत समझने पर भी वह नहीं मानें और उनके साथ अय़ोध्या आ गए। बजरंग बली भगवान हमेशा से ही राम जी की सेवा करके अपना जीवन बिताना चाहते थे। एक बार उन्होंने माता सीता को मांग में सिंदूर भरते हुए देखा था।

तो हनुमान जी ने इससे संबंधित सवाल सीता जी पहुंच ही लिया। इस पर माता सीता ने कहा कि वह प्रभु राम को प्रसन्न करने के लिए सिंदूर लगाती है। फिर क्या था इतना सुनने भर से ही हनुमान जी ने सिंदूर का एक बड़ा बक्सा लिया और अपने ऊपर उड़ेल लिया और साधी राम जी के पास चले गए। हनुमान जी को सिंदूर में लिपटा देख राम जी हैरानी में पड़ गए। जब उन्होंने हनुमान जी से ऐसा करने का कारण पहुंचा तो उन्होंने बताया कि सिंदूर लगाने पर आप जैसे माता सीता से प्रसन्न रहते है तो अब आप मुझसे भी उतने ही प्रसन्न रहना। तब श्री राम को अपने भोले-भाले भक्त हनुमान की युक्ति पर बहुत हंसी आई और सचमुच हनुमान के लिए श्री राम के मन में जगह और गहरी हो गई।

रावन का इतिहास

रावण का जन्म और नामकरण

लोग लंकापति रावण को अनीति, अनाचार, दंभ, काम, क्रोध, लोभ, अधर्म और बुराई का प्रतीक मानते हैं और उससे घृणा करते हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यहां यह है कि दशानन रावण में कितना ही राक्षसत्व क्यों न हो उसके गुणों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

रावण में अवगुण की अपेक्षा गुण अधिक थे। रावण एक प्रकांड विद्वान था। वेद-शास्त्रों पर उसकी अच्छी पकड़ थी और वह भगवान भोलेशंकर का अनन्य भक्त था। उसे तंत्र, मंत्र, सिद्धियों तथा कई गूढ़ विद्याओं का ज्ञान था। ज्योतिष विद्या में भी उसे महारथ हासिल थी।

रावण के जन्म का रहस्य -

रावण के उदय के विषय में भिन्न-भिन्न ग्रंथों में भिन्न-भिन्न प्रकार के उल्लेख मिलते हैं। वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण महाकाव्य,पद्मपुराण तथा श्रीमद्‍भागवत पुराण के अनुसार हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकशिपु दूसरे जन्म में रावण और कुंभकर्ण के रूप में पैदा हुए।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण पुलस्त्य मुनि का पोता था अर्थात् उनके पुत्र विश्वश्रवा का पुत्र था। विश्वश्रवा की वरवर्णिनी और कैकसी नामक दो पत्नियां थी। वरवर्णिनी के कुबेर को जन्म देने पर सौतिया डाह वश कैकसी ने अशुभ समय में गर्भ धारण किया।

इसी कारण से उसके गर्भ से रावण तथा कुंभकर्ण जैसे क्रूर स्वभाव वाले भयंकर राक्षस उत्पन्न हुए। तुलसीदास जी के रामचरितमानस में रावण का जन्म शाप के कारण हुआ है। वे नारद एवं प्रतापभानु की कथाओं को रावण के जन्म का कारण बताते हैं।

पौराणिक कथा-

इसके अनुसार भगवान विष्णु के दर्शन हेतु सनक, सनंदन आदि ऋषि बैकुंठ पधारे परंतु भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें प्रवेश देने से इंकार कर दिया। ऋषिगण अप्रसन्न हो गए और क्रोध में आकर जय-विजय को शाप दे दिया कि तुम राक्षस हो जाओ। जय-विजय ने प्रार्थना की व अपराध के लिए क्षमा मांगी।

भगवान विष्णु ने भी ऋषियों से क्षमा करने को कहा। तब ऋषियों ने अपने शाप की तीव्रता कम की और कहा कि तीन जन्मों तक तो तुम्हें राक्षस योनि में रहना पड़ेगा और उसके बाद तुम पुनः इस पद पर प्रतिष्ठित हो सकोगे। इसके साथ एक और शर्त थी कि भगवान विष्णु या उनके किसी अवतारी स्वरूप के हाथों तुम्हारा मरना अनिवार्य होगा।
यह शाप राक्षसराज, लंकापति, दशानन रावण के जन्म की आदि गाथा है। भगवान विष्णु के ये द्वारपाल पहले जन्म में हिरण्याक्ष व हिरण्यकशिपु राक्षसों के रूप में जन्मे। हिरण्याक्ष राक्षस बहुत शक्तिशाली था और उसने पृथ्वी को उठाकर पाताललोक में पहुंचा दिया था।

पृथ्वी की पवित्रता बहाल करने के लिए भगवान विष्णु को वराह अवतार धारण करना पड़ा था। फिर विष्णु ने हिरण्याक्ष का वधकर पृथ्वी को मुक्त कराया था।
हिरण्यकशिपु भी ताकतवर राक्षस था और उसने वरदान प्राप्तकर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया था। भगवान विष्णु द्वारा अपने भाई हिरण्याक्ष का वध करने की वजह से हिरण्यकशिपु विष्णु विरोधी था और अपने विष्णुभक्त पुत्र प्रह्लाद को मरवाने के लिए भी उसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

फिर भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकशिपु का वध किया था। त्रेतायुग में ये दोनों भाई रावण और कुंभकर्ण के रूप में पैदा हुए और तीसरे जन्म में द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया, तब ये दोनों शिशुपाल व दंतवक्त्र नाम के अनाचारी के रूप में पैदा हुए थे।

क्यों पड़ा रावण का दशानन नाम-

रावण को दशानन कहते हैं। उसका नाम दशानन उसके दशग्रीव नाम पर पड़ा। कहते हैं कि महातपस्वी रावण ने भगवान शंकर को एक-एक कर अपने दस सिर अर्जित किए थे।

उस कठोर तपस्या के बल पर ही उसे दस सिर प्राप्त हुए, जिन्हें लंका युद्ध में भगवान राम ने अपने बाणों से एक-एक कर काटा था।

यदि रावण ने कठोर तपस्या से अर्जित अपने उन दस सिरों की बुद्धि का सार्थक और सही इस्तेमाल किया होता,तो शायद इतिहास में अपनी प्रकांड विद्वता के लिए अमर हो जाता और लोग उससे घृणा नहीं करते, बल्कि उसकी पूजा करते।

गणेश जन्म उत्सव🎉🎊🎁

श्री गणेश जी के जन्म की कहानी

श्रीगणेश के जन्म की कथा भी निराली है। वराहपुराण के अनुसार भगवान शिव पंचतत्वों से बड़ी तल्लीनता से गणेश का निर्माण कर रहे थे। इस कारण गणेश अत्यंत रूपवान व विशिष्ट बन रहे थे। आकर्षण का केंद्र बन जाने के भय से सारे देवताओं में खलबली मच गई। इस भय को भांप शिवजी ने बालक गणेश का पेट बड़ा कर दिया और सिर को गज का रूप दे दिया।

दूसरी कथा शिवपुराण से है। इसके मुताबिक देवी पार्वती ने अपने उबटन से एक पुतला बनाया और उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने इस प्राणी को द्वारपाल बना कर बैठा दिया और किसी को भी अंदर न आने देने का आदेश देते हुए स्नान करने चली गईं। संयोग से इसी दौरान भगवान शिव वहां आए। उन्होंने अंदर जाना चाहा, लेकिन बालक गणेश ने रोक दिया। नाराज शिवजी ने बालक गणेश को समझाया, लेकिन उन्होंने एक न सुनी।

क्रोधित शिवजी ने त्रिशूल से गणेश का सिर काट दिया। पार्वती को जब पता चला कि शिव ने गणेश का सिर काट दिया है, तो वे कुपित हुईं। पार्वती की नाराजगी दूर करने के लिए शिवजी ने गणेश के धड़ पर हाथी का मस्तक लगा कर जीवनदान दे दिया। तभी से शिवजी ने उन्हें तमाम सामर्थ्य और शक्तियां प्रदान करते हुए प्रथम पूज्य और गणों का देव बनाया।

गणेश के पास हाथी का सिर, मोटा पेट और चूहा जैसा छोटा वाहन है, लेकिन इन समस्याओं के बाद भी वे विघ्नविनाशक, संकटमोचक की उपाधियों से नवाजे गए हैं। कारण यह है कि उन्होंने अपनी कमियों को कभी अपना नकारात्मक पक्ष नहीं बनने दिया, बल्कि अपनी ताकत बनाया। उनकी टेढ़ी-मेढ़ी सूंड बताती है कि सफलता का पथ सीधा नहीं है।

यहां दाएं-बाएं खोज करने पर ही सफलता और सच प्राप्त होगा। हाथी की भांति चाल भले ही धीमी हो, लेकिन अपना पथ अपना लक्ष्य न भूलें। उनकी आंखें छोटी लेकिन पैनी है, यानी चीजों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करना चाहिए। कान बड़े है यानी एक अच्छे श्रोता का गुण हम सबमें हमेशा होना चाहिए।

राम-सीता का विवाहराम-सीता का विवाह जय श्री राम

राम-सीता का विवाह

श्रीरामचरितमानस के अनुसार- महाराजा जनक ने सीता के विवाह हेतु स्वयंवर रचाया। सीता के स्वयंवर में आए सभी राजा-महाराजा जब भगवान शिव का धनुष नहीं उठा सकें, तब ऋषि विश्वामित्र ने प्रभु श्रीराम से आज्ञा देते हुए कहा- हे राम! उठो, शिवजी का धनुष तोड़ो और जनक का संताप मिटाओ।

गुरु विश्वामित्र के वचन सुनकर श्रीराम तत्पर उठे और धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए आगे बढ़ें। यह दृश्य देखकर सीता के मन में उल्लास छा गया। प्रभु की ओर देखकर सीताजी ने मन ही मन निश्चय किया कि यह शरीर इन्हीं का होकर रहेगा या तो रहेगा ही नहीं।

माता सीता के मन की बात प्रभु श्रीराम जान गए और उन्होंने देखते ही देखते भगवान शिव का महान धनुष उठाया। इसके बाद उस पर प्रत्यंचा चढ़ाते ही एक भयंकर ध्वनि के साथ धनुष टूट गया। यह देखकर सीता के मन को संतोष हुआ।

फिर सीता श्रीराम के निकट आईं। सखियों के बीच में जनकपुत्री सीता ऐसी शोभित हो रही थ‍ी, जैसे बहुत-सी छबियों के बीच में महाछबि हो। तब एक सखी ने सीता से जयमाला पहनाने को कहा। उस समय उनके हाथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो डंडियोंसहित दो कमल चंद्रमा को डरते हुए जयमाला दे रहे हो। तब सीताजी ने श्रीराम के गले में जयमाला पहना दी। यह दृश्य देखकर देवता फूल बरसाने लगे। नगर और आकाश में बाजे बजने लगे।

श्रीराम-सीता की जोड़ी इस प्रकार सुशोभित हो रही थी, मानो सुंदरता और श्रृंगार रस एकत्र हो गए हो। पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग में यश फैल गया कि श्रीराम ने धनुष तोड़ दिया और सीताजी का वरण कर लिया। इसी के मद्देनजर प्रतिवर्ष अगहन मास की शुक्ल पंचमी को प्रमुख राम मंदिरों में विशेष उत्सव मनाया जाता है।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम-सीता के शुभ विवाह के कारण ही यह दिन अत्यंत पवित्र माना जाता है। भारतीय संस्कृति में राम-सीता आदर्श दम्पत्ति माने गए हैं।

जिस प्रकार प्रभु श्रीराम ने सदा मर्यादा पालन करके पुरुषोत्तम का पद पाया, उसी तरह माता सीता ने सारे संसार के समक्ष पतिव्रता स्त्री होने का सर्वोपरि उदाहरण प्रस्तुत किया। इस पावन दिन सभी को राम-सीता की आराधना करते हुए अपने सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए प्रभु से आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

माँ पर कविता

   मां पर कविता मैं अपने छोटे मुख कैसे करूँ तेरा गुणगान माँ तेरी समता में फीका-सा लगता भगवान माता कौशल्या के घर में जन्म राम ने पाया ठ...